ओमप्रकाश राजभर दावा चाहे जो कर रहे हों, लेकिन उनके लिए भाजपा से अलग होना बहुत आसान नहीं है। भाजपा ने उनके पुत्र सहित अन्य कई लोगों को निगम और बोर्डों में पद दे रखे हैं। इन पदों पर बैठे लोगों को भी पता है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार अभी कम से कम तीन वर्ष और रहनी है। फिर चुनाव लड़ने के बाद भी अच्छे पद पर समायोजन की कोई गारंटी तो है नहीं।
यह वजह तो नहीं
प्रदेश में पिछड़ों की आबादी में कुर्मियों की संख्या लगभग 8 प्रतिशत है जबकि राजभर समाज की आबादी लगभग 3 प्रतिशत है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि अपना दल को अब दो सीटें न देने से लगभग 8 प्रतिशत आबादी वाले कुर्मी छिटक सकते हैं, पर राजभर की पार्टी के लिए भी भाजपा यदि सीट छोड़ती है तो उसके हिस्से में 78 सीटों से कम आएंगी।
भाजपा के रणनीतिकार अपनी लड़ने वाली सीटें कम नहीं करना चाहते। कारण, पार्टी को पता है कि कम सीटें लड़ने पर न सिर्फ वोट का प्रतिशत कम निकलता है बल्कि भाजपा के कमजोर होने का भी संदेश जाता है।
सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर सीटों का बंटवारा न होने पर बुधवार को भाजपा से रिश्ता तोड़ने का एलान करने वाले थे। वह दिन भर भाजपा के संदेश की प्रतीक्षा करते रहे और देर रात तक कोई फैसला नहीं ले सके। लिहाजा उनका एलान फिर टल गया है।
अब बृहस्पतिवार को वह कोई फैसला ले सकते हैं। इसके पहले 26 मार्च को वह भाजपा से अलग होने का अल्टीमेटम दे चुके थे, लेकिन बाद में इसे एक दिन के लिए टाल दिया था। समर्थकों और मीडिया कर्मियों की बुधवार सुबह से ही कालिदास मार्ग स्थित राजभर के आवास पर आवाजाही लगी रही, लेकिन वह किसी से नहीं मिले।
अलबत्ता उनके पुत्र व सुभासपा के महासचिव अरविंद और अरुण राजभर ही लोगों से मिले और बताया कि पार्टी अध्यक्ष रणनीति पर चर्चा के लिए कहीं गए हुए हैं। सूत्रों की मानें तो सुबह भाजपा के प्रदेश चुनाव प्रभारी जेपी नड्डा और अरविंद राजभर की फोन पर जरूर बात हुई थी, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलने के बाद राजभर परिवार में मायूसी छा गई है। हालांकि यह भी चर्चा थी कि नड्डा ने अरविंद को आश्वस्त किया है कि सीट देने के मुद्दे पर जल्द फैसला किया जाएगा।