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ओमप्रकाश राजभर की पार्टी को एक भी सीट देने के मूड में नहीं भाजपा, ये भी है एक वजह

Thu, 28 Mar 2019 11:34 AM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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ओम प्रकाश राजभर - फोटो : amar ujala
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सियासी हवाओं में भले ही सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के तीखे तेवर तमाम अटकलों को जन्म दे रहे हों, सीटों के बंटवारे को लेकर भी कयास लग रहे हों, पर भाजपा फिलहाल ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा को लोकसभा की एक भी सीट देने के मूड में नहीं है।

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हालांकि भाजपा का कोई पदाधिकारी इस बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ बोलना नहीं चाहता, लेकिन पार्टी के रणनीतिकारों ने यह फैसला ले लिया है।

भाजपा के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है कि अनुप्र्रिया पटेल की अगुआई वाले अपना दल (सोनेलाल) और सुभासपा की परस्पर तुलना नहीं की जा सकती। अनुप्रिया का दल पिछले लोकसभा चुनाव में राजग में शामिल हो चुका था। उस समय कहीं यह तय नहीं था कि भाजपा की सरकार बनेगी। इसलिए अपना दल के लिए दो सीटें छोड़ना भाजपा की नैतिक जिम्मेदारी है।

इसके विपरीत ओमप्रकाश राजभर की पार्टी विधानसभा चुनाव के पहले भाजपा के साथ आई थी। इसलिए लोकसभा चुनाव में इसके लिए सीट छोड़ने का भाजपा पर कोई नैतिक दबाव नहीं है।

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राजभर के लिए भाजपा से अलग होना आसान नहीं

ओमप्रकाश राजभर दावा चाहे जो कर रहे हों, लेकिन उनके लिए भाजपा से अलग होना बहुत आसान नहीं है। भाजपा ने उनके पुत्र सहित अन्य कई लोगों को निगम और बोर्डों में पद दे रखे हैं। इन पदों पर बैठे लोगों को भी पता है कि प्रदेश में भाजपा की सरकार अभी कम से कम तीन वर्ष और रहनी है। फिर चुनाव लड़ने के बाद भी अच्छे पद पर समायोजन की कोई गारंटी तो है नहीं।

यह वजह तो नहीं
प्रदेश में पिछड़ों की आबादी में कुर्मियों की संख्या लगभग 8 प्रतिशत है जबकि राजभर समाज की आबादी लगभग 3 प्रतिशत है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि अपना दल को अब दो सीटें न देने से लगभग 8 प्रतिशत आबादी वाले कुर्मी छिटक सकते हैं, पर राजभर की पार्टी के लिए भी भाजपा यदि सीट छोड़ती है तो उसके हिस्से में 78 सीटों से कम आएंगी।

भाजपा के रणनीतिकार अपनी लड़ने वाली सीटें कम नहीं करना चाहते। कारण, पार्टी को पता है कि कम सीटें लड़ने पर न सिर्फ वोट का प्रतिशत कम निकलता है बल्कि भाजपा के कमजोर होने का भी संदेश जाता है।
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बुधवार को दिनभर करते रहे इंतजार पर नहीं लिया कोई फैसला

सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर सीटों का बंटवारा न होने पर बुधवार को भाजपा से रिश्ता तोड़ने का एलान करने वाले थे। वह दिन भर भाजपा के संदेश की प्रतीक्षा करते रहे और देर रात तक कोई फैसला नहीं ले सके। लिहाजा उनका एलान फिर टल गया है।

अब बृहस्पतिवार को वह कोई फैसला ले सकते हैं। इसके पहले 26 मार्च को वह भाजपा से अलग होने का अल्टीमेटम दे चुके थे, लेकिन बाद में इसे एक दिन के लिए टाल दिया था। समर्थकों और मीडिया कर्मियों की बुधवार सुबह से ही कालिदास मार्ग स्थित राजभर के आवास पर आवाजाही लगी रही, लेकिन वह किसी से नहीं मिले।

अलबत्ता उनके पुत्र व सुभासपा के महासचिव अरविंद और अरुण राजभर ही लोगों से मिले और बताया कि पार्टी अध्यक्ष रणनीति पर चर्चा के लिए कहीं गए हुए हैं। सूत्रों की मानें तो सुबह भाजपा के प्रदेश चुनाव प्रभारी जेपी नड्डा और अरविंद राजभर की फोन पर जरूर बात हुई थी, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिलने के बाद राजभर परिवार में मायूसी छा गई है। हालांकि यह भी चर्चा थी कि नड्डा ने अरविंद को आश्वस्त किया है कि सीट देने के मुद्दे पर जल्द फैसला किया जाएगा।
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