भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओम माथुर ने मंगलवार को बुंदेलखंड, कानपुर और अवध क्षेत्र के पार्टी सांसदों के एक साल से अधिक के कामकाज की समीक्षा की। उन्होंने जो कुछ पढ़ाया या समझाया उससे साफ हो गया कि वह नसीहत देना चाहते हैं कि हवा में न उड़ें। लोगों से मिलना-जुलना बंद न करें।
माथुर ने कहा कि कार्यकर्ताओं से संपर्क और संवाद बढ़ाएं। कार्यालय खुलवाएं और उनमें बैठें भी। जिस दिन खुद बाहर हों तो पार्टी के किसी वरिष्ठ व्यक्ति को बैठाकर उसे लोगों की समस्याएं सुनने की जिम्मेदारी दें।
सांसदों को हिदायत दी कि लोकसभा चुनाव में विधानसभा क्षेत्रवार मिले वोट सुरक्षित रखना और उनमें बढ़ोतरी करना भी जिम्मेदारी है। जिससे विधानसभा के 2017 के चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर न रहे।
इन कामों की भी हुई पूछतांछ
सांसदों को संगठन की आजीवन सहयोग निधि में भी योगदान करने को कहा गया। साथ ही उनसे संसदीय क्षेत्र में विकास कार्यों की स्थिति के बारे में जानकारी ली गई। यह भी पूछा गया कि उनकी विकास निधि की स्थिति इस समय क्या है।
इसी के साथ 24 से 27 जून तक तहसील स्तर पर होने वाले धरना-प्रदर्शन तथा 29 जून से 1 जुलाई के बीच में होने वाले जिला स्तर प्रदर्शन और 4 जुलाई को लखनऊ में सांसदों के धरने में शामिल होने का निर्देश भी दिया गया।
भाजपा प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने बताया कि प्रदेश प्रभारी ओम माथुर, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के साथ प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल ने भी सांसदों से कामकाज की जानकारी ली। सांसदों ने योजनाओं को लागू करने में जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का आरोप लगाया।
यह भी आरोप लगाया कि राज्य सरकार पक्षपात कर रही है। सांसदों के प्रस्ताव में अनावश्यक अड़ंगेबाजी की जाती है। बिजली के बढ़े दामों और उसकी उपलब्धता को लेकर लोगों में जबरदस्त आक्रोश है। किसानों के मुआवजे को लेकर सूबे की सरकार की सियासत से भी लोग नाराज हैं तो कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर निराश।
मंत्रियों को छोड़कर बाकी रहे मौजूद
बैठक में केंद्र सरकार में मंत्री हो चुके सांसदों को पहले ही नहीं बुलाया गया था। शेष में ज्यादातर सांसद मौजूद थे। राजधानी के एक वाटर पार्क में लगी इस क्लास में सांसदों को क्षेत्र में दिखाई देने के साथ पार्टी का कामकाज करने की भी नसीहत दी गई।
कहा गया कि वे यह न समझें कि सांसद होने के बाद उन्हें दूसरी जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल गई है। सांसदों पर 2017 के चुनाव को लड़ने की भी जिम्मेदारी है। इसलिए उन्हें लोकसभा चुनाव में मिले वोटों को न सिर्फ संभालकर रखना है बल्कि इसमें बढ़ोतरी की भी चिंता करनी है।
विधानसभा चुनाव में सांसदों के क्षेत्र में पार्टी के प्रत्याशी को कम वोट मिले तो उसकी जिम्मेदारी सांसद की भी होगी।