इसके बावजूद बीते साढ़े चार वर्ष में प्रदेश में कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिसे ब्राह्मण उत्पीड़न के रूप में पेश करने की कोशिश की गई। घटनाओं से निपटने के तौर-तरीके ने कई बार उत्पीड़न की धारणा को और गहरा बनाने का काम किया। नतीजा ये हुआ कि जगह-जगह नाराजगी खुलकर सामने आने लगी।
पंचायत चुनावों में भाजपा के तमाम ब्राह्मण चेहरों की हार ने इसे और भी हवा देने का काम किया। बताया जा रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा नेतृत्व ब्राह्मणों की नाराजगी को कम करने के लिए शासन व सरकार के ब्राह्मण चेहरों को साधने, अपने ब्राह्मण नेताओं को तवज्जो के साथ विपक्ष में रहकर ब्राह्मण समाज की आवाज बनने वाले चेहरों को जोड़ने की रणनीति पर चल पड़ा है। सरकार के स्तर से मनोनयन व नियुक्तियों में भी इन्हें तवज्जो दी जा सकती है।