प्रदेश में 80 सीटों पर प्रत्याशी तय करने में भाजपा अब तक सबसे पीछे है।
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लंबी कवायद के बाद अब तक सिर्फ 70 सीटों के प्रत्याशी ही घोषित हो पाए हैं। दस सीटों के उम्मीदवार तय नहीं हो पाए हैं।
आश्चर्यजनक यह है कि इनमें रायबरेली व अमेठी जैसी वे सीटें भी शामिल हैं, जहां पार्टी के पास गंवाने को बहुत कुछ नहीं है तो संतकबीरनगर व मिर्जापुर की वे सीटें भी जहां भाजपा के दो पूर्व प्रदेश अध्यक्षों के बेटे दावेदार हैं।
लगता है, एक-दूसरे का खेल बिगाड़ने और अपना खेल बनाने के चक्कर में इन सीटों के प्रत्याशी तय नहीं हो पा रहे हैं।
खींचतान से फंसा मामला
संतकबीरनगर में 2009 के आम चुनाव में पूर्व प्रदेश भाजपा अध्यक्ष डॉ. रमापति राम त्रिपाठी के पुत्र शरद त्रिपाठी को और मिर्जापुर से पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह के पुत्र अनुराग को टिकट दिया गया था।
शरद दूसरे और अनुराग तीसरे नंबर पर रहे थे। ये दोनों इस बार भी टिकट के दावेदार हैं।
पर, फैसला नहीं हो पा रहा है। नेताओं की खींचतान की वजह से मामला फंसा हुआ है।
गठबंधन या नेताओं पर बंधन
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश सिंह के पुत्र अनुराग की दावेदारी वाली मिर्जापुर सीट को अपना दल से गठबंधन के दांव में उलझा दिया गया है।
जाहिर है, निशाना अनुराग से ज्यादा उनके पिता ओमप्रकाश सिंह पर है। कुछ नेता उन पर सियासी बंधन लगाना चाहते हैं। इसी दांव में प्रतापगढ़ व फूलपुर सीटों को भी उलझा दिया गया है।
मजेदार यह कि अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल पिछले दिनों भाजपा के साथ न जाने की बात कह चुकी हैं। पर, भाजपा नेतृत्व अब भी अपना दल से गठबंधन का तर्क दे रहा है।
सूत्रों का कहना है कि एक बड़े नेता गठबंधन का खेल करके इन सीटों पर अपने लोगों को उतारकर उन्हें उपकृत करना चाहते हैं।
इससे पहले भी यह नेता चुनाव में इसी तरह का खेल करते रहे हैं। पता चला है कि बदायूं का मामला डीपी यादव के इंतजार में लटका है।
यह है वजह
संतकबीरनगर में फैसला न हो पाने का बड़ा कारण, पूर्वांचल का एक प्रमुख भगवा चेहरा भी बताया जाता है।
वह गोरखपुर और आसपास भाजपा की राजनीति को अपनी अंगुलियों पर चलाना चाहते हैं। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में जिस तरह पूरे भाजपा नेतृत्व ने उनके सामने समर्पण किया, उससे उन्हें ताकत मिलती रही है।
वह संतकबीरनगर से प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री के पुत्र को टिकट दिलाना चाहते हैं। इससे चिढ़कर उनके विरोधी खेमे ने इस सीट पर पार्टी के एक प्रदेश उपाध्यक्ष का नाम आगे कर दिया है। इस चक्कर में मामला उलझा हुआ है।
रायबरेली व अमेठी पर भी उलझा मामला
सोनिया गांधी और राहुल गांधी के रायबरेली व अमेठी सीटों पर भी मामला उलझ गया है।
रायबरेली में प्रत्याशी न बनाए जाने की आशंका से ग्रस्त सर्वोच्च न्यायालय के वकील अजय अग्रवाल तीन दिनों तक भाजपा मुख्यालय पर धरना दे चुके हैं।
अमेठी में भी पार्टी के पास कोई मजबूत दावेदार दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। पर, यहां का टिकट भी घोषित नहीं हुआ।
कुछ लोग आरोप लगा रहे हैं कि कुछ नेताओं ने अपनी व अपनों की सीटों का समीकरण साधने के लिए इन सीटों को अभी खाली छोड़ रखा है।
हाथरस (सु.) से पूर्व मंत्री अशोक प्रधान को टिकट मिलना तय माना जा रहा था लेकिन पिछले चुनाव में कल्याण के भाजपा छोड़ने की वजह बने प्रधान को टिकट देने के लिए कल्याण की सहमति जरूरी हो गई है।
कल्याण अभी तक सहमत नहीं हो पाए हैं। अमरोहा में जाट समीकरण व नेताओं की पसंद में मामला उलझा है।
किसान नेता राकेश टिकैत के रालोद से मैदान में उतरने के बाद भाजपा के सामने असमंजस खड़ा हो गया है।
कुछ नेता इस सीट पर गूजर उम्मीदवार उतारना चाहते हैं तो कुछ यहीं से सांसद रह चुके चेतन चौहान की पैरोकारी कर रहे हैं।