लखनऊ, अदब और तहजीब के साथ सियासत का ऐसा शहर है, जहां से होकर दिल्ली के दरवाजे खुलते हैं। ऐसे में सभी पार्टियां उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ पर कब्जा जमाना चाहती हैं। यही वजह है कि बीते तीन दशक में पहली बार सपा, बसपा और कांग्रेस सहित प्रमुख विपक्षी दलों ने किसी बाहरी नामचीन या फिर बॉलीवुड के सितारों पर दांव नहीं लगाया है। इस बार गठबंधन के तहत सपा ने लखनऊ मध्य के विधायक एवं पार्टी के कद्दावर नेता रविदास मेहरोत्रा और बसपा ने लखनऊ उत्तरी से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके सरवर अली को मैदान में उतारकर चुनाव को रोमांचक बना दिया है। जीत का ऊंट किस करवट बैठेगा यह तो मतगणना के बाद ही पता चलेगा, लेकिन चर्चा है कि कई साल बाद विपक्ष ने भाजपा को घेरने की मजबूत घेराबंदी की है।
- आंकड़ों पर गौर करे तो लखनऊ संसदीय क्षेत्र से 1991 से लेकर 2019 तक लगातार भाजपा जीतती आ रही है। यदि 1996 के आम चुनाव से लेकर अब तक की बात करें तो यहां से सपा, कांग्रेस, आप या फिर बसपा की ओर से काई न कोई बाहरी नामचीन चेहरा या फिर किसी बॉलीवुड के सितारे को टिकट देकर चुनावी मैदान में उतारा जाता रहा है। हालांकि इस शहर पर न तो कभी बॉलीवुड के सितारों का जादू चला है और न ही किसी बड़े नामचीन नाम का असर हुआ। सभी को यहां हार का सामना करना पड़ा है।
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- अब लगभग तीन दशक के बाद भाजपा को टक्कर देने के लिए इंडिया गठबंधन की ओर से सपा ने अपने स्थानीय विधायक एवं कद्दावर नेता रविदास मेहरोत्रा को मैदान में उतारा है। वहीं बसपा ने सरवर अली को टिकट देकर मुकाबले को रोमांचक बना दिया है। सरवर अली पूर्व में लखनऊ की उत्तरी सीट से विधानसभा का चुनाव लड़ चुके हैं। उनकी पत्नी भी मेयर का चुनाव लड़ चुकी हैं। हालांकि दोनों को चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था। राजनीति के जानकार बताते हैं कि इस बार सपा कांग्रेस में गठबंधन होने और चुनावी मैदान में स्थानीय कद्दावर नेताओं के आ जाने से चुनाव बेहद दिलचस्प हो गया है।
स्थानीय मुद्दे
- वैसे तो लोकसभा चुनाव देश के मुद्दे पर लड़ा जाता है, लेकिन स्थानीय मुद्दों का भी महत्व होता है। आशियाना के रहने वाले अंकित कुमार, सुजीत सिंह का कहना है कि 2014 के बाद 2019 में विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ा गया था। लेकिन लखनऊ का मुद्दा था रोजाना का लगने वाला जाम, सुरक्षा, सड़क, बिजली पानी, अनियमित कॉलोनियों का नियमितीकरण रहा है। हालांकि जाम से निजात दिलाने के लिए किसान पथ का निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका है। इसकी वजह से रिंग रोड पर लगने वाला जाम ख़त्म होगा। इसके अलावा कई फ्लाईओवर को मंजूरी दी गई है, जिनमें कई पर काम शुरू हो चुका है।
- शहर को स्वच्छ बनाने के लिए भी कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। गोमती नदी के सफाई का मुद्दा भी अहम है। स्मार्ट सिटी के तौर पर विकसित करने के लिए मॉडर्न ट्रैफिक मैनेजमेंट पर भी तेजी से काम हो रहा है।
तीसरी बार राजनाथ सिंह मैदान में
लखनऊ संसदीय क्षेत्र में शहर की 5 विधानसभा सीटें लखनऊ (पश्चिम) लखनऊ उत्तर, लखनऊ पूर्व, लखनऊ मध्य और लखनऊ कैन्टोनमैन्ट शामिल हैं। इस संसदीय सीट से पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 91 से लेकर 2004 तक 5 बार सांसद चुने गए।
- 2009 में लाल जी टंडन और 2014 एवं 2019 में राजनाथ सिंह निर्वाचित हुए। एक बार फिर 2024 में राजनाथ हैट्रिक लगाने के लिए मैदान में हैं। भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी देश के तीन बार प्रधानमंत्री रहे। पहली बार 1996 में, 13 दिन दूसरी बार 1998 में 13 महीने और तीसरी बार लगातार 1999 से 2004 तक 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया।
बसपा सुप्रीमो के करीबी हैं सरवर
- बहुजन समाज पार्टी ने लखनऊ सीट से सरवर मलिक को उम्मीदवार बनाया है। सरवर मालिक लखनऊ की उत्तरी सीट से 2022 में बसपा के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं। हालांकि इस चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इतना ही नहीं बीते नगर निगम चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने बसपा नेता सरवर मलिक की पत्नी शाहीन बानो को लखनऊ मेयर के लिए उम्मीदवार घोषित किया था। उन्हें भी बीजेपी की सुषमा खर्कवाल ने शिकस्त दे दी थी। सरवर मलिक की गिनती बसपा सुप्रीमो मायावती के बेहद करीबियों में होती है।
... तो त्रिकोणीय हो सकता है मुकाबला
- सपा ने लखनऊ मध्य से विधायक रविदास मेहरोत्रा को उम्मीदवार बनाया है। रविदास ने केकेसी से अपनी राजनीति शुरू की थी। उनकी गिनती मुलायम सिंह के करीबियों में होती है। इसी के चलते सपा ने भाजपा का गढ़ में सेंध लगाने की जिम्मेदारी रविदास को सौंपी है। हालांकि बसपा ने लखनऊ सीट पर मुस्लिम दांव खेल दिया है। लखनऊ में ठीक-ठाक मुस्लिम आबादी होने के कारण मुकाबला त्रिकोणीय बन सकता है। सरवर मलिक के मजबूत चुनाव लड़ने से इंडिया गठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार रविदास मेहरोत्रा को नुकसान हो सकता है।
राजधानी में नामचीन चेहरों ने आजमाई किस्मत
शत्रुघ्न सिन्हा व सोनाक्षी ने किया प्रचार
वर्ष 2019 में पूर्व बीजेपी नेता फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को गठबंधन की उम्मीदवार रहीं हैं। इस चुनाव में शत्रुघ्न सिन्हा और बेटी सोनाक्षी ने खूब प्रचार प्रसार किया और कई फिल्म स्टार भी प्रचार में आए, लेकिन लेकिन लखनऊ ने उन्हें तवज्जो नहीं दी।
जावेद की जमानत तक जब्त हो गई
साल 2014 के ही चुनाव में आप ने मशहूर कमेडियन जगदीप के बेटे एवं बॉलीवुड अभिनेता जावेद जाफरी को मैदान में उतारा था। लेकिन उन्हें भी निराश होना पड़ा था।
राज बब्बर के इरादों पर फिरा पानी
साल 1996 के चुनाव में सपा ने राज बब्बर को मैदान में उतारा, चुनावी इरादों पर पानी फेर दिया था। राज बब्बर की एक झलक पाने के लिए भीड़ टूट पड़ती थी, लेकिन करारी हार ने राज बब्बर के इरादों पर पानी फेर दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी फिर जीते।
राज घराने के कर्ण सिंह भी रहे नाकाम
1999 कश्मीर के राज घराने से ताल्लुक रखने वाले दिग्गज कांग्रेसी नेता डॉ. कर्ण सिंह ने लखनऊ की राजनीतिक जमीन पर अपनी चुनावी फसल उगाने की कोशिश की, लेकिन यहां भी वह फसल नहीं हुए। अटल ही सबकी पहली बने।
मुजफ्फर अली का स्टेटस काम नहीं आया
वर्ष 1998 में उमराव जान जैसी मशहूर फिल्म बनाने वाले और कोटवारा स्टेट के शाही परिवार से ताल्लुक रखने वाले मुजफ्फर अली ने सपा के झंडे तले लखनऊ से चुनाव लड़ने उतरे, लेकिन जीत का सेहरा एक बार फिर अटल के सिर बंधा।