‘जोड़तोड़ व खरीद-फरोख्त से हासिल की गई सत्ता को मैं चिमटे से भी छूना पसंद नहीं करूंगा।’ वर्ष 1996 में लोकसभा में अटल बिहारी वाजपेयी का यह वाक्य सभी को याद होगा।
दिल्ली विधानसभा के पिछले चुनाव में भाजपा ने इसी तर्क के साथ सरकार बनाने से इन्कार कर दिया था, पर लगता है कि समय के साथ भाजपा भी बदल गई। न उसे अब जोड़तोड़ से परहेज रह गया है और न सिद्धांतों से समझौता करने में कोई गुरेज।
अनुशासन का दावा तो बहुत पीछे छूट गया है। विधान परिषद चुनाव में विधायकों की जरूरी संख्या न होते हुए भी दूसरा उम्मीदवार उतारना इसका ताजा प्रमाण है।
भाजपा के पास सिर्फ 41 विधायक हैं। इस आधार पर वह एक ही उम्मीदवार को जिता सकती है, पर पार्टी ने दो उम्मीदवार उतारकर जोड़तोड़ व विधायकों की खरीद-फरोख्त का रास्ता खोल दिया है।
इनमें लक्ष्मण आचार्य को तो केंद्रीय संसदीय बोर्ड ने घोषित किया है, जबकि दयाशंकर सिंह का नामांकन बाद में कराया गया। स्वाभाविक रूप से भाजपा को सबसे पहले आचार्य की सीट निकालने के लिए प्रथम वरीयता के वोटों के लिए 32 विधायकों का कोटा उन्हें आवंटित करना ही पड़ेगा।
इसके बाद पार्टी के पास सिर्फ नौ वोट ही बचेंगे। दयाशंकर की सीट निकालने के लिए उसे 23 वोटों का इंतजाम करना होगा।