अमर सिंह भाजपा में आएंगे या नहीं, इस सवाल का जवाब तो भविष्य में मिलेगा, लेकिन जो स्थितियां हैं, उनके मद्देनजर भाजपा कांटे से कांटा निकालने की तर्ज पर अमर का इस्तेमाल कर सकती है।
आज की परिस्थितियों में भाजपा शायद ही उन्हें गले लगाने से परहेज करे। कुछ और न सही, वे भाजपा के लिए विरोधियों पर वार का हथियार तो बन ही सकते हैं। खास तौर से यूपी में सपा जैसे राजनीतिक विरोधी के खिलाफ।
भले ही ओम माथुर इसे दो दोस्तों की शिष्टाचार मुलाकात बता रहे हों लेकिन यह बात आसानी से हजम होने वाली नहीं है। आखिर अमर ने उन ओम माथुर से मुलाकात की है जो अब भाजपा के प्रदेश प्रभारी हैं, जहां 2017 का चुनावी समर लड़ा जाना है।
इसे जीते बिना नरेंद्र मोदी या भगवा टोली की विजय यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी। राज्यसभा से रिटायर होने के अगले ही दिन अमर को अपने मित्र ओम माथुर की अचानक याद आना सामान्य बात नहीं मानी जा रही है।
अमर को है यूपी की गहरी समझ
अगर मुलाकात सिर्फ शिष्टाचार तक ही सीमित है तो अमर ने यह शिष्टाचार राजनाथ सिंह व कलराज मिश्र जैसे नेताओं के साथ लंबे समय से क्यों नहीं निभाया, जो कम से कम ओम माथुर जैसे ही उनके मित्रों में शुमार होते हैं।
इसलिए संभावना इस बात की भी है कि माथुर ने अमर से यूपी की राजनीतिक आबोहवा व समीकरणों को समझने के लिए उन्हें आमंत्रित किया हो। भले ही अमर फिलहाल किसी बडे़ राजनीतिक दल में न हों लेकिन यूपी की राजनीतिक बिसात व दांवपेंच की सियासत की उन्हें गहरी समझ है।
सिर्फ चर्चा में रहने को नहीं मुलाकात
कहा यह भी जा रहा है कि चर्चाओं में रहना अमर की खूबी है। इसलिए उन्होंने माथुर से मुलाकात करके ठीक उसी तरह से खुद को चर्चा में ला दिया, जिस तरह पिछले दिनों उन्होंने मुलायम सिंह से मुलाकात करके तरह-तरह की सियासी अटकलों को जन्म दे दिया था।
बात सिर्फ चर्चाओं तक है और चर्चाओं तक ही रहेगी, पर यह तर्क आज की परिस्थितियों में गले नहीं उतरता। अमर राजनीति के ऐसे किरदार हैं जो चर्चा में रहने के साथ ही हमेशा सक्रिय भूमिका में रहना पसंद करते हैं।
अमित शाह पहले ही दे चुके हैं संकेत
अमर का सियासी सफर देखने से साफ हो जाता है कि वे राजनीति की दुनिया से ज्यादा दिन दूर नहीं रह सकते। अब जब उनके लिए पुराने घर सपा के दरवाजे खुल नहीं पा रहे हैं, लोकसभा चुनाव की वैतरणी पार करने के लिए जिस रालोद की नाव पर वे सवार हुए थे, वह बीच धारा में ही डगमगा गई।
बची कांग्रेस व बसपा, तो उनकी भी ऐसी स्थिति नहीं दिख रही कि अमर सिंह को पार उतार सकें। ऐसे में उनके पास भाजपा के अलावा दूसरा विकल्प ही नहीं है।
जहां तक भाजपा की बात है तो राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पहले ही कह चुके हैं कि परिवार बढ़ेगा तो लोग आएंगे ही।
इसलिए आने वालों के अतीत की चिंता छोड़ ध्यान इस बात पर है कि जो आए वह भाजपा की नीतियों पर चले। जाहिर है अमर को गले लगाने में भाजपा कोई संकोच नहीं करेगी।
बड़े नेताओं पर करा सकते हैं हमला
आज की स्थिति को देखते हुए कोई आसानी से यह नहीं मानेगा कि भाजपा को अमर की कोई जरूरत है, पर गहराई से विश्लेषण करें तो ऐसा नहीं है। भाजपा के लिए वे फायदे का भी सौदा हो सकते हैं।
पार्टी को अमर के रूप में एक ऐसा वक्ता तो मिल ही जाएगा जो सपा सुप्रीमो मुलायम से लेकर कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी तक पर हमला बोलने के साथ ही इन नेताओं के अतीत को उधेड़कर भाजपा की मदद कर सकता है।
प्रदेश में ठाकुरों की एक खास जमात के बीच भाजपा का समर्थक ग्रुप खड़ा कर सकता है तो दूसरे दलों में मौजूद कुछ बड़े चेहरों को भाजपा के करीब ला सकता है।
फिर भाजपा जब उन जगदंबिका पाल को गले लगा सकती है जिन्होंने प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार को गिराने का षड्यंत्र किया था तो अमर सिंह उनसे तो काफी बेहतर ही हैं।