बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव
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राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता, अगर इसे किसी ने मिसाल बनाया है तो वह हैं नीतीश कुमार। तीसरे नंबर की पार्टी और मात्र तीन फीसदी अपनी कुर्मी बिरादरी (सहयोगी कुइरी जाति जोड़ दें तो पांच फीसदी) के नेता होने के बावजूद नीतीश अगर 20 साल से निष्कंटक राज कर रहे हैं तो इसकी एक बड़ी वजह उनकी इधर-उधर होने की रणनीति मानी जाती है। वक्त-बेवक्त पलटूराम बनना उनकी मजबूरी या दूरदृष्टि, यह प्रश्न अभी निरुत्तर है। बड़ी बात यह भी है कि बीजेपी जैसी बड़ी और सयानी पार्टी को अपने पीछे खड़ा रखना।
खिल्ली उड़ाए लेकिन उनके वोटर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। गोपालगंज से मुजफ्फरपुर जाते वक्त मोतीपुर अनुमंडल (तहसील) के हाईवे के गांव पाड़ापुर में खेत में काम कर रहे कुछ लोग बातचीत में जो दर्शन पेश करते हैं वो यह है कि नीतीश कुमार एक दवा हैं, कड़वी हो या मीठी, यहां के लोग उसी के आसरे हैं। पिछले दिनों कुछ वीडियो के बहाने नीतीश के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य पर चुहलबाजी का जिक्र होता है तो एक बुजुर्ग बोल पड़ते हैं.. सड़क में तो गड्ढा नहीं है ना जी, कहीं भी हो। जिनका दिमाग बहुत चलता था, तनी उनका काम देख लीजिए। 74 साल के नीतीश से लोगों की सहानुभूति है, हमदर्दी है, कोफ्त या शिकायत नहीं। विपक्ष आरोप लगाता है कि उनकी पार्टी उन्हें तय स्क्रिप्ट देती है ताकि ऐसे संवेदनशील समय में वे कुछ ऐसा-वैसा न बोल दें।