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यूपी का रण : जवाब ढूंढ़ते बुनियादी सवाल, भाजपा को कहीं सपा, तो कहीं कांग्रेस और बसपा से टक्कर मिलने के आसार

Tue, 11 Jan 2022 09:50 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

झांसी, ललितपुर, बांदा, चित्रकूट और महोबा के कैसे मिजाज हैं, कैसे सवाल हैं बता रहे हैं पुनीत शर्मा और प्रदीप अवस्थी...
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वोट डालने के लिए लाइन में लगे मतदाता (फाइल फोटो) - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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चुनावी मौसम है। मौसम है, तो मिजाज बदलेगा ही। बदल भी रहा है। कहना कुछ, करना कुछ...। बहुत सारे सवाल हैं। नेताओं में भी, और जनता में भी। विकास चाहिए। बड़ी-बड़ी तकरीरें। बड़ी-बड़ी दलीलें। पर, कुरेदते ही जाति, मजहब की रेखाएं स्पष्ट तौर पर दिखने लगती हैं! फुफकारने लगती हैं! इतना विरोधाभास! तब कैसा शिकवा? तब कैसी शिकायत? क्यों...?  मतदान करने से पहले खुद को आईने में देखना जरूरी है। खुद से सवाल करना जरूरी है। जरूरी है अपने अंदर छिपे विरोधाभास को भी टटोलना। इस सबसे हम कहीं बेहतर फैसला कर सकेंगे।

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सबसे पहले बात चुनावी समरभूमि की। झांसी, ललितपुर, चित्रकूट, बांदा और महोबा में विधानसभा की कुल 14 सीटें हैं। सभी सीटों पर 2017 में भगवा परचम फहराया था। चुनावी मौसम आते ही सियासी कब्जे को लेकर रस्साकशी शुरू हो गई है। कोई विकास और राष्ट्रवाद के सहारे अपनी नैया पार लगाना चाहता है, तो कोई जाति और धर्म के भरोसे सत्ता के सिंहासन तक पहुंचना चाहता है। पर, दुर्भाग्य से बुंदेलखंड की पहचान के साथ सूखा, पलायन, अन्ना जानवरों के आतंक के साथ ही किसानों की आत्महत्या का दाग चस्पा हो गया है। पक्ष और विपक्ष दोनों ही इस सबके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी झांसी और महोबा के दौरे के दौरान पानी की समस्या के लिए जहां पूर्ववर्ती सरकारों और विपक्ष को घेरा, तो वहीं 2594 करोड़ की लागत से अर्जुन डैम का लोकार्पण और झांसी जिले में डिफेंस कॉरिडोर की शुरुआत करके बुंदेलखंड में लहलहाती भगवा फसल को खाद-पानी देने की कोशिश की। महोबा के आल्हा-ऊदल और झांसी की रानी के किले से राष्ट्रवाद को भी धार दी। भाजपा के लिए जहां महंगाई, खाद, पानी, बिजली की समस्या से नाराज मतदाताओं को मनाकर बुंदेलखंड में अपनी जीत को दोहराने की बड़ी चुनौती है, तो वहीं पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान गुंडागर्दी, माफियाराज और जातिवाद जैसे आरोपों से घिरे विपक्ष के लिए भी बुंदेलखंड की पथरीली धरती पर जीत का परचम फहराना आसान नहीं होगा। पिछले चुनाव में झांसी की चार और ललितपुर की दोनों सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी, जाहिर सी बात है कि इन सीटों पर भाजपा के सामने एक बार फिर अपना प्रदर्शन दोहराने की चुनौती है। राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें तो यहां भाजपा की कहीं सपा, कांग्रेस से तो कहीं बसपा से टक्कर होने के आसार हैं। सपा के गठबंधन वाले दल रालोद का इस क्षेत्र में कोई खास प्रभाव फिलहाल नजर नहीं आ रहा है।

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झांसी : जातीय गणित पर भी पैनी नजर

झांसी सदर सीट की बात करें तो कुछ अपवादों को छोड़कर इस सीट पर ज्यादातर ब्राह्मण विधायक ही रहे हैं। भाजपा से भी राजेंद्र अग्निहोत्री, रवींद्र शुक्ला और रवि शर्मा विधायक रहे हैं। इसे देखते हुए भाजपा ब्राह्मण चेहरे को दोहरा सकती है। उधर, सदर विधानसभा सीट पर ब्राह्मण मतदाताओं के अलावा कुशवाहा और साहू वोटरों की भी अच्छी खासी संख्या है। ऐसे में सपा और बसपा की जातीय गणित पर पैनी नजर है। इलाइट चौराहा पर स्थित एक रेस्टोरेेंट में चाय की चुस्कियंों के साथ चुनावी चर्चा में मशगूल मिले आशीष प्रजापति कहते हैं, चुनाव के दौरान उमा भारती ने तीन साल के अंदर बुंदेलखंड प्रांत का वादा किया था, पर पूरा नहीं हुआ। इसके पहले भी इस क्षेत्र से चार जनप्रतिनिधि ऐसे रहे हैं, जो पृथक बुंदेलखंड के मुद्दे पर सवार होकर लोकसभा और विधानसभा तक पहुंचे, लेकिन इस मुद्दे को भूल गए। वहीं, सीपरी बाजार के टंडन रोड पर मिले रूपेश वर्मा दूसरे मुद्दे को उठाते हैं। वह कहते हैं, महानगर को स्मार्ट सिटी बना दिया गया। शहर के मुख्य इलाकों में विकास कार्य भी हुए हैं, पर अंदर के क्षेत्र अब भी उपेक्षित और बदहाल हैं। तो दूसरी तरफ पंकज शुक्ला और मयंक परमार्थी का कहना है कि डिफेंस कॉरिडोर, सीपरी बाजार ओवरब्रिज और खजुराहो फोरलेन को इस सरकार की उपलब्धियों में गिना जा सकता है। पर, झांसी महानगर की पानी और बिजली जैसी मूलभूत समस्याओं से लोगों को आज भी मुक्ति नहीं मिल सकी है।

बबीना : सभी की नजर पिछड़ों पर

बबीना विधानसभा क्षेत्र की बात करें तो यहां बहुसंख्यक यादव व लोधी मतदाताओं के इर्द-गिर्द ही सारा सियासी खेल चलता है। बसपा ने अपने पुराने प्रत्याशी पूर्व विधायक कृष्णपाल सिंह राजपूत का टिकट काटकर दशरथ राजपूत नन्ना को मैदान में उतारने का एलान करके सबको चौंका दिया है। उधर, कृष्णपाल राजपूत ने भाजपा का दामन थामकर नए सियासी समीकरण को जन्म दे दिया है। भाजपा को भरोसा है कि कृष्णपाल के पार्टी में आने से लोधी वोट बैंक को एकतरफा जाने से रोका जा सकता है। सपा प्रत्याशी यशपाल सिंह को भी यादवों के साथ ही पिछड़ा वोट बैंक का सहारा है। बहरहाल, बबीना कस्बे के त्रिलोकी नाथ मंदिर के सामने चाय की दुकान पर चल रही चुनावी चर्चा में शामिल अमित शर्मा कहते हैं, यूपी की सीमा से लगकर बेतवा नदी से मध्यप्रदेश की राजघाट नहर निकली है, पर यहां के किसानों को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता है। लोगों के आंदोलन के बाद बेतवा नदी के घाट से नहर निकालने का काम भी शुरू हुआ था, पर अब भी अधूरा ही पड़ा है। ढिकौली गांव के डोमागोर रोड पर स्थित एक दुकान पर युवाओं की चौपाल जमी हुई थी। इनमें शामिल विकास राजपूत कहते हैं, रक्सा से ढिकौली जाने वाले मार्ग पर पूरे पांच साल गड्ढों में पानी भरा रहा। चुनाव नजदीक आया तब सड़क का काम शुरू हुआ।

गरौठा-मऊरानीपुर : होगी कांटे की टक्कर

गरौठा विधानसभा क्षेत्र में यादव, कुर्मी और लोधी बहुतायत हैं। इस बार इस सीट पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह का नाम भी चल रहा है। सपा यहां दूसरी सीटों की तुलना में खासी मजबूत दिखती है। भरोेसा गांव में हमें मिले रामप्रकाश सियासी चर्चा छिड़ते ही कहते हैं, ‘सरकार काऊ की आ जाए, हमें तो ढोर बछेऊ से फसल बचावो मुश्किल पररऔ। रात कैं घरे नईं पर पा रए। कौंदरे की ठंड में आग बारकैं रात भर खेतन पै बैठने परत। गऊशाला ऐन बनी पै किसानन खौं आराम कछू नईं परौ।’ रामप्रकाश अन्ना पशुओं से हो रही परेशानी को जिस तरह बयां करते हैं, उससे साफ है कि यह समस्या यहां मुद्दा बन रही है। वहीं, मऊरानीपुर की बात करें तो यहां दलित वोटों की अधिकता है।  बेरोजगारी, बुनकरों की समस्या के अलावा किसानों की समस्या प्रमुख मुद्दे हैं। 

महोबा : समस्याओं पर मुखर हैं लोग

महोबा सीट पर ब्राह्मण और क्षत्रिय मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। अर्जुन सहायक जल परियोजना से पेयजल और सिंचाई, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे के काम को भाजपा अपने उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही है। रिंग रोड, केन-बेतवा परियोजना, किडारी फाटक पर आरओबी, मेडिकल कॉलेज, कबरई से महोबा फोरलेन, पहरा गांव में उद्योग की स्थापना के कार्य प्रस्तावित हैं। छुट्टा पशुओं की समस्या तो हर तरफ सुनाई देती है। इस सीट के करीब एक चौथाई हिस्से में पेयजल की समस्या को लेकर भी सवाल लोगों के बीच है। ग्राम पंचायत सिजहरी के निवासी विजय पाल सिंह राजपूत कहते हैं, छुट्टा पशुओं और महंगाई को लेकर ही आम लोगों में नाराजगी ज्यादा है। कस्बा श्रीनगर के मुहाल मनोहर गंज निवासी सुरेश कुमार सोनी का मानना है कि श्रीनगर में आम लोग विकासखंड नहीं होने से निराश हैं। वहीं, अन्ना गोवंश बड़ा मु्द्दा है। इसका फायदा दूसरे दलों को मिल रहा है। चरखारी सीट की बात करें तो यह इलाका लोधी बहुल है। चरखारी को पर्यटन के लिहाज से विकसित किया गया है। खेल के मैदान, विवाह घर और बनवाई गई सड़कों के कामों को विधायक अपनी उपलब्धियों के तौर पर पेश कर रहे हैं। विधानसभा क्षेत्र के मनप्यारे कुशवाहा का कहना है कि जो वादे हुए उनमें से कितने पूरे हुए, इस सबका लोग मूल्यांकन कर रहे हैं। नरेंद्र पांडेय भी कुछ ऐसे ही सवाल उठाते हैं। 

ललितपुर : विकास पर भारी पड़ते जातीय समीकरण

ललितपुर जिले की सदर सीट सामान्य है तो महरौनी सुरक्षित। दोनों ही सीटों पर भाजपा अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए रात-दिन एक किए हुए है। सपा इन सीटों पर परचम फहराने के लिए पूरा जोर लगाए हुए है। दोनों ही सीटों पर जातीय समीकरण हावी रहते हैं। सदर में जहां कुशवाहा व लोधी तो महरौनी में अहिरवार व दलित मतदाता भारी पड़ते हैं। दोनों ही सीटों पर फिलहाल आमना-सामना भाजपा और सपा में ही होता दिखाई दे रहा है। नझाई बाजार में चाय की दुकान पर चुनावी चर्चा करते मिले सुमित अग्रवाल व प्रिंस राठौर कहते हैं, सरकार का विकास और राष्ट्रवाद बेशक सराहनीय है, पर जिले में खाद की किल्लत के दौरान किसान दम तोड़ देते हैं, अन्ना पशुओं से बचाव के लिए खेतों की रखवाली करते, सिंचाई करते सर्पदंश व अन्य वजहाें से किसानों की मौत होती है, तो यह चिंता की बात है। महरौनी विधानसभा क्षेत्र के पाली चौराहे पर भी कुछ ऐसे ही सवाल सुनाई दिए।

बांदा : दलों के दावे और वादों को परख रहे लोग

बांदा की चारों विधानसभा सीटों पर भाजपा के विधायक हैं। यह सभी पहली बार विधायक बने। कोई राजनीतिक बड़ी पहचान नहीं होने के बावजूद भाजपा की लहर ने इन्हें विधानसभा पहुंचा दिया। जहां तक विधायकों के प्रति आम मतदाताओं की राय है, तो किसी का जादू मतदाताओं पर सिर चढ़कर नहीं बोलता दिखता। आम लोगों की राय में यही रुझान नजर आ रहा है कि प्रत्याशी से ज्यादा पार्टियों के मुद्दे चुनावी समीकरण तय करेंगे। बुंदेलखंड के प्रमुख व्यक्तियों में शुमार किसान प्रेम सिंह कहते हैं, अपेक्षाएं तो बहुत सारी थीं। खासकर किसानों को। पर, काफी हद तक उम्मीदें पूरी नहीं हुईं। छुट्टा पशुओं की समस्या बढ़ती ही चली गई। महंगाई पर भी लोगों में बहुत सवाल हैं। पर, इस सबका यह मतलब नहीं कि भाजपा सरकार ने कुछ नहीं किया। काफी कार्य किए हैं, लेकिन पिछली बार की तरह पार्टी की राह उतनी आसान नहीं दिखती है।
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चित्रकूट : विकास कार्यों को अपने पैमाने पर परख रहे लोग

जिले में दो विधानसभा सीट चित्रकूट और मानिकपुर हैं। लोगों में जिस तरह से चर्चाएं हैं, उससे तो कमोबेश 2017 की ही तस्वीर यहां उभरती दिख रही है। तब सपा की भाजपा से सीधी लड़ाई हुई थी। मानिकपुर क्षेत्र की गुड़िया कोल कहती हैं,बस बातें ही ज्यादा हुई हैं, धरातल पर काम नहीं दिखा। तो मऊ के हरीकांत मिश्र कहते हैं, आवास, शौचालय व पेंशन से लेकर कई क्षेत्र में सरकार ने बेहतरीन काम किए हैं। ऑनलाइन प्रक्रिया से भ्रष्टाचार पर भी काफी हद तक अंकुश लगा है। कर्वी की राधिका देवी का मानना है कि स्वच्छता से लेकर सुंदरीकरण के कामों से चित्रकूट और निखरा है। वहीं, लोढ़वारा के सिद्धार्थ त्रिपाठी कहते हैं, पिछली सरकार के कामों को ही रंगरोगन कर आगे बढ़ाया गया है।
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