एक नजर जिंदगी पर
इंदु बताती हैं कि अलीगढ़ में 1950 में जन्म हुआ। हम चार बहनें और दो भाई हैं। पिता उदयचंद्र शर्मा सरकारी सेवा में थे। उनके तबादलों से हमारी शिक्षा प्रदेश के कई शहरों में हुई। शिक्षा के साथ संस्कार की अहमियत मां ने हमें समझाई। पढ़ाई के साथ सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने को वे हमेशा प्रेरित करती थीं।
1968 में मेरी शादी इंजीनियर श्रीराम सारस्वत से हुई। वे भी शिक्षा को अहमियत देते थे थे। उनका ही प्रोत्साहन था कि शादी के बाद बीएड और एमए कर सकी। वहीं, सास भगवान देवी हमेशा कहती थीं कि ‘जिन्हें तुम्हारी जरूरत हो वक्त पर उनके काम जरूर आओ।’ मायके और ससुराल से मिली इस नसीहत को जब जिंदगी में उतारा तब पता चला कि ‘संतुष्टि’ किसे कहते हैं।
समाजसेवा का सफर
बढ़ती उम्र ने समाजसेवा में मेरी सक्रियता बढ़ा दी। दूसरों के काम आकर जो सुख मिलता है वह कहीं और नहीं मिलता। एक समाजसेवी क्लब के साथ गरीब, बेसहारा बेटियों की शादी करवाने की पहल की। शुरुआत में मुश्किलें आईं पर हौसले ने कभी हारने नहीं दिया।
अब तक बिना किसी सरकारी सहायता के कई बेटियों के हाथ पीले करवा चुकी हूं। अभी गरीब बेटियों को रोजगार परक शिक्षा दिलाने में जुटी हूं। इरादा है इन्हें आर्थिक रूप से मजबूती दिलाकर शादी करवा दूं। अपने सीमित साधनों की वजह से इन दिनों सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों से मिलने वाली मदद को पात्रों तक पहुंचाती हूं।
एक दौर था जब आकाशवाणी ही मनोरंजन का साधन था। लोग रेडियो सेट के सामने बेसब्री से पसंदीदा कार्यक्रमों का इंतजार करते थे। पति की ही प्रेरणा थी कि आकाशवाणी से जुड़ सकी और उसके कई धारावाहिक कार्यक्रमों का हिस्सा बनी। मुझे याद है कि घर-घर में लोग मुझे मेरी आवाज से जानते थे।
खुद पर यकीन करना कभी नहीं छोड़ना चाहिए। साथ ही इंसान को कभी भी किसी से भी कुछ भी सीखने की आदत डालनी चाहिए। खुद का दायरा बढ़ा कर टीमवर्क को अहमियत देना भी आज की बेटियों को आना चाहिए।