नगर विकास मंत्री आजम खां के बागी स्टाफ के सामने आगे कुआं-पीछे खाईं वाले हालात नजर आ रहे हैं।
आरोप पत्र पाने, लेकिन निलंबन से बचने की वजह से उन्हें यह तय करना खासा मुश्किल हो रहा है कि शासन का रवैया उनके फेवर में है या खिलाफ।
वह अपने आरोपों पर स्टैंड लें या नरम रुख अख्तियार करें। हालांकि संकेत है कि कर्मचारी विधिक राय लेकर आरोप पत्र का जवाब देने की तैयारी कर रहे हैं।
दरअसल मंत्री केबागी स्टाफ और सचिवालय संघ अध्यक्ष के खिलाफ शासन ने पहले कड़े कार्रवाई के संकेत दिए थे। मगर आगामी 12 नवंबर को कर्मचारी महासंघ के प्रस्तावित हड़ताल के मद्देनजर शासन ने अपनी रणनीति में बदलाव कर दिया।
बदली रणनीति में न सिर्फ सचिवालय संघ अध्यक्ष के खिलाफ कार्रवाई से हाथ रोक लिए बल्कि कर्मचारियों को भी निलंबित न कर पहले आरोप पत्र देने की कार्रवाई की गई।
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अब शासन जहां अपने कागजी कार्रवाई में लगा हुआ है सचिवालय संवर्ग के कुछेक संगठन बागी स्टाफ को यह समझाने की कोशिश में लगे हुए हैं कि शासन ने मामले को ठंडा बनाने का मन बना लिया है।
इसी वजह से बिना निलंबन के आरोप पत्र दिया गया है। ऐसे में जवाब ऐसा नहीं होना चाहिए कि सुलझता मामला फिर उलझ जाए।
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प्रकरण पर बारीकी से नजर रख रहे एक अधिकारी बताते हैं कि आरोपी कर्मियों की सबसे बड़ी उलझन यही है कि वह अपने स्टैंड पर कायम रखते हुए आरोप पत्र का सटीक जवाब दें या फिर नरम रुख अख्तियार करें। इलेक्ट्रानिक चैनल पर अपनी बात रखने के बाद उन्हें इससे पीछे हटना संभव नहीं रहा।
उन्हें इस बात का भी पूरा अंदेशा है कि यदि आरोप पत्र के जवाब में नरमी बरतेंगे तो भी और यदि मंत्री के खिलाफ आरोपों पर डटे रहते हैं तो भी कार्रवाई से बचना मुश्किल है।
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ऐसे में अब इन कर्मियों द्वारा आरोप पत्र पर जो जवाब दिया जाएगा, वह बड़ा मायने रखेगा। हालांकि संकेत है कि कर्मचारियों ने इस द्वंद्व से बाहर निकलते हुए आरोप पत्र का जवाब विधिक सलाह लेकर देने का फैसला किया है। उन्हें आरोप पत्र मिलने के 15 दिन में आरोपों का जवाब देना है।
क्या मंत्री पर आरोपों की भी होगी जांच?
शासन ने जांच अधिकारी प्रमुख सचिव चीनी एवं गन्ना विकास राहुल भटनागर को केवल आरोपी स्टाफ की अनुशासनहीनता से जुड़ी जांच सौंपी है।
कर्मियों को दिए गए आरोप पत्र से पता चलता है कि स्टाफ द्वारा इलेक्ट्रानिक चैनल पर मंत्री पर लगाए गए आरोप और बिना अनुमति मंत्री कार्यालय छोड़ने जैसे बिंदुओं को जांच का विषय बनाया गया है।
मगर कर्मचारियों ने जिस आरोप को लेकर मंत्री के साथ काम करने से इंकार किया, उस पर प्रक्रिया मौन है।
सवाल उठाया जा रहा है कि क्या विवाद के मूल बिंदु की पड़ताल के बिना आगे की कार्रवाई नैसर्गिक न्याय को प्रभावित नहीं करेगी? वैसे तर्क दिया जा रहा है कि प्रमुख सचिव को मंत्री के खिलाफ जांच का अधिकार नहीं होता।