अमर उजाला की ओर से आयोजित कार्यक्रम ‘पुलिस की पाठशाला’ के दौरान आयुष्मान खुराना और एडीजी आदित्य मिश्रा से युवाओं ने कई रोचक तो कुछ अचंभित करने वाले सवाल भी किए। आयुष्मान ने उनका जवाब देते हुए जातिगत भेदभाव, आरक्षण और हमारे देश में मौजूद सामाजिक संरचना समेत कई विषयों को रोचक ढंग से समझाया। पढ़िए कैसा रहा ये वार्तालाप :
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महेशचंद्र देवा : जब आपने पहली बार संविधान का ‘आर्टिकल 15’ पढ़ा तो आपने खुद को और समाज को लेकर क्या महसूस किया?
आयुष्मान : मैंने कुछ समय पहले एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘इंडिया अनटच्ड’ देखी, जिसमें बताया गया कि किस प्रकार साल 2019 में भी तमिलनाडु में गांवों से एक वंचित समुदाय का नागरिक अगर सवर्ण समुदायों के क्षेत्र से गुजरता है तो उसे अपनी चप्पल उतारकर जाना पड़ता है।
गुजरात के गांवों में समाज के बांटे ऊंचे और नीचे वर्गों के लिए अलग-अलग कुएं तय कर दिए गए हैं, यानी पानी का भी बंटवारा हो गया है। इस तरह का भेदभाव सिर्फ भारत में देखा जाता है, दुनिया में ऐसा कहीं देखने को नहीं मिलता। मुझे लगता है कि अगर आप देश से प्रेम करते हैं तो देश के उस वंचित वर्ग के बारे में भी सोचना होगा जो 70 प्रतिशत है। हम जो शहरी भारत में रहते हैं, अक्सर गांवों में होने वाले भेदभावों को समझ नहीं पाते।
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वहां रूढ़िवाद, जातिवाद जैसी चीजों को आप और हम ही खत्म कर सकते हैं। मैं कॉलेज के समय से नुक्कड़ नाटक काफी किया करता था। वहां सामाजिक मुद्दों और व्यवस्था पर सवाल उठाए जाते हैं। मुझे लगता है कि यह फिल्म भी मेरे जीवन के उसी दौर का विस्तार है। मैं इन मुद्दों को कलाकार के तौर पर समझता हूं और चाहता भी था कि इस प्रकार की फिल्मों में काम कर सकूं।
प्रियंका : सर, यह फिल्म किस बारे में है?
आयुष्मान : ‘आर्टिकल 15’ महत्वपूर्ण फिल्म है, मैं चाहूंगा कि आप व आपकी उम्र के युवा इसे जरूर देखें। क्योंकि आप ही हैं जो आने वाले समय में देश की बागडोर संभालेंगे। आप ही हैं जो नागरिकों को उनके धर्म या जाति से नहीं पहचानेंगे बल्कि समझाएंगे कि हम सब एक हैं, हिंदुस्तानी हैं।
नूपुर पाल : आरक्षण व्यवस्था को लेकर काफी सवाल उठाए जाते हैं, यह सही है या गलत?
आयुष्मान : मुझसे इस तरह के सवाल काफी पूछे जाते हैं। आरक्षण जटिल प्रश्न है, इसके फायदे और नुकसान दोनों हैं। लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हमारे देश में कई वर्षों से भेदभाव होता आया है। आप शहरी क्षेत्र में फिर भी देख सकते हैं कि अंतरजातीय विवाह हो रहे हैं, लेकिन गांवों में ऐसा सोचना मुश्किल है। लोग यह भी सोचते हैं कि आरक्षण की वजह से भेदभाव होते हैं, ऐसा नहीं है। भेदभाव की वजह से आरक्षण है। जिस दिन हमारे देश से भेदभाव खत्म हो जाएगा, उस दिन आरक्षण भी अपने आप खत्म हो जाएगा।
सिमरन कुमारी : यह फिल्म बनाने का विचार कहां से आया?
आयुष्मान : विचार तो अनुभव सिन्हा को आया। हालांकि मैं भी इस मुद्दे पर फिल्म करना चाहता था। हमारे यहां सिनेमा हमेशा समाज से कुछ न कुछ लेता और उसे देता आया है। समाज के किसी विचार या व्यवस्था पर सिनेमा के जरिए कटाक्ष भी होता रहा है। यह विचार भी समाज से ही आया।
वरिषा : हम नागरिक पुलिस के पास जाने से आज भी डरते क्यों हैं? इस डर को कैसे खत्म करें?
इस सवाल का पुलिस अधिकारी आदित्य मिश्रा ने जवाब दिया कि पहले तो आप आकर मुझसे हाथ मिलाएं, मुझे लगता है कि इससे पुलिस के प्रति डर कुछ कम होगा। दूसरी बात, यह बताना चाहूंगा कि आज पुलिस तकनीक का सहारा लेकर खुद नागरिकों के पास आ रही है। कुछ दिन पहले ही ‘टॉक-कॉप’ जैसा एप्लीकेशन शुरू किया गया, जहां शिकायतें दर्ज की जा सकती हैं। पुलिस की ओर से लगातार प्रयास हो रहे हैं।
अक्षत श्रीवास्तव : लखनऊ में आप फिल्मों का फिल्मांकन बहुत करते हैं, आगे भी करेंगे?
आयुष्मान : फिलहाल मैं बाला फिल्म का फिल्मांकन कर रहा हूं। इसके तुरंत बाद ‘गुलाबो-सिताबो’ के फिल्मांकन के लिए लखनऊ आऊंगा। इसमें अमिताभ बच्चन के साथ हूं। इसमें मैं जुलाई में शामिल रहूंगा।
शिप्रा : ग्रामीण क्षेत्रों में काफी भेदभाव होता हैं, वहां आपकी फिल्म नहीं पहुंच सकती?
आयुष्मान : शहरी क्षेत्रों में जातिगत भेदभाव पर ज्यादा बात नहीं होती है, हाल ही मुंबई में डॉ. पायल की आत्महत्या भी एक जातिगत मुद्दा था। यह बताता है कि जातिवाद शहर और ग्रामीण, दोनों जगह है। मुझे लगता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में खुलेआम भेदभाव किया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इस फिल्म का पहुंचना जरूरी है। इसके लिए हम कोशिश कर रहे हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा प्रदर्शन किया जाए। द्वितीय व तृतीय श्रेणी के शहरों तक इसे पहुंचाने का हम प्रयास करेंगे।
आदित्री उपाध्याय : विक्की डोनर जैसी फिल्म जब आप करने जा रहे थे, तो आपके माता-पिता और दोस्तों ने कुछ कहा नहीं ?
आयुष्मान : मैं पहले भी एक टीवी कार्यक्रम में यह कर चुका था। मुझे लगता है कि परिवार में खुले विचार हों और जागरूकता हो, समाज के लिए बेहतर होगा। हमारे समय में तो स्कूलों में किशोर-शिक्षा भी नहीं होती थी, लेकिन यह समाज के लिए जरूरी है। प्रगतिशील समाज में इन विषयों पर बात होती रहनी चाहिए, मैं कोशिश करूंगा कि आगे भी इस प्रकार के विषयों पर फिल्में करता रहूं।
‘आपसे मिलकर जवाब मिल गया’
वार्तालाप की शुरुआत राजधानी के नजरबाग के रहने वाले मोहम्मद अकरम खान ने रोचक अंदाज में की। उन्हाेंने बताया कि ‘आर्टिकल 15’ फिल्म की शूटिंग उनके घर के नीचे ही हुई है। साथ ही अपनी नन्ही बिटिया के बारे में बताया कि वह रामपुर से लखनऊ आयुष्मान को नमस्कार करने के लिए आई है। अभिभूत हुए आयुष्मान ने इस प्रेम के लिए अकरम का बहुत आभार जताया। अकरम ने कहा उन्हें आयुष्मान से मिलकर ही अपना जवाब मिल गया।