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Amethi: अमेठी में दो बार आमने-सामने आ चुके हैं 'गांधी', जनता की उलझन बढ़ी जब राजीव के सामने आ गईं मेनका

Thu, 28 Mar 2024 12:19 PM IST
ishwar ashish नंदलाल तिवारी, अमर उजाला, लखनऊ

सार

1984 के चुनाव में जब राजीव गांधी के सामने उनके छोटे भाई संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी मैदान में उतरीं तो जनता भी असमंजस में आ गई। जीत दर्ज करने के लिए मेनका ने 1982 से ही यहां के दौरे बढ़ा दिए थे।
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राजीव गांधी-मेनका गांधी। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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अमेठी का नाम आते ही गांधी परिवार की चर्चा सबसे पहले शुरू होती है। असल में यहां की राजनीतिक तस्वीर ही कुछ ऐसी है। बेहद रोचक...रोमांचित करने वाली...और सबसे बड़ी बात चौंकाने वाली भी। चुनावी इतिहास ही कुछ ऐसा है। यहां पर दो बार गांधी परिवार के बीच ही मुकाबला हो चुका है। हैरानी की बात तो यह है कि दोनों बार विरासत एक बड़ा मुद्दा था। पहले चुनाव में वारिस कौन तो दूसरे चुनाव में असली गांधी कौन की गूंज। यह बात अलग है कि दोनों चुनावों में शिकस्त खाने वाले गांधी ने दोबारा से अमेठी की तरफ घूमकर भी नहीं देखा।

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वर्ष 1980 में संजय गांधी ने यहां से पहली बार जीत दर्ज की। उसी साल विमान हादसे में उनकी मौत के बाद 1981 में हुए उपचुनाव में राजीव गांधी मैदान में उतरे। यहां से उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी शुरू की। इसके बाद सियासत ने रंग दिखाना शुरू कर दिया। वर्ष 1984 का चुनाव उस वक्त दिलचस्प हो गया जब कांग्रेस के राजीव गांधी के सामने उनके स्वर्गीय छोटे भाई संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी ने निर्दल प्रत्याशी के तौर पर मोर्चा  खोल दिया। 

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उलझन में थी जनता... मेनका गांधी ने 1982 से ही अमेठी का दौरा शुरू कर सक्रियता बढ़ा दी थी। ऐसे में जब वह चुनाव में उतरीं तो अमेठी की जनता उलझन में पड़ गई। एक ओर इंदिरा की हत्या के बाद जनता की सहानुभूति राजीव गांधी के साथ थी तो वहीं दूसरी ओर अमेठी के सांसद रहे संजय गांधी की विधवा मेनका गांधी के प्रति आत्मीय लगाव, लेकिन बाजी राजीव ने ही मारी। 

असली बनाम नकली गांधी की रही गूंज... दूसरा मुकाबला वर्ष 1989 में हुआ, जब कांग्रेस के राजीव गांधी के सामने महात्मा गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी ने ताल ठोंक दी। उस वक्त जनता दल व भाजपा ने संयुक्त रूप से राजमोहन गांधी पर भरोसा जताया था। इस चुनाव में असली बनाम नकली गांधी का मुद्दा खूब उछला। कई बड़े दिग्गज नेताओं ने सभा की। आरोप प्रत्यारोप के खूब शब्दवाण चले, लेकिन अमेठी की जनता ने एक बार फिर राजीव गांधी का साथ दिया। 

और जब सोनिया ने संभाली प्रचार की कमान... वर्ष 1984 में राजीव गांधी को प्रचार के लिए पहली बार सोनिया गांधी को मैदान में उतारना पड़ा। हालांकि उस वक्त सोनिया ने कोई सभा तो नहीं की, लेकिन वह घर-घर जाकर महिलाओं से मिल रही थीं। पूरे चुनाव तक उन्होंने ही प्रचार की बागडोर संभाली।
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संशय में दावेदारी
- वर्ष 1977 से लेकर अब तक यह पहला मौका है, जब कांग्रेस टिकट को लेकर उलझन में है। अमेठी से 2019 के चुनाव में शिकस्त खाने के बाद राहुल गांधी को दोबारा से मैदान में उतारने के लिए कांग्रेसी लगातार पैरवी कर रहे हैं। धरना भी दिया। 
- अभी दिल्ली तक की दौड़ भी लगा रहे हैं, लेकिन  कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल पा रहा है। यह बात अलग है कि फिजाओं में कई नाम हर रोज तैर रहे हैं। ऐसे में इस बार भाजपा की स्मृति जूबिन इरानी के सामने मैदान में कौन उतरेगा? इसको लेकर अभी तक तस्वीर साफ नहीं है।  

1984 का चुनाव 
- कुल मतदाता : 740782
- कुल मतदान करने वाले मतदाता : 436263
- कुल प्रत्याशी : 31
- विजेता : राजीव गांधी, कांग्रेस, प्राप्त मत : 365041
- रनर अप : मेनका गांधी, निर्दल, प्राप्त मत : 50163

1989 का चुनाव 
- कुल मतदाता :910177
- कुल मतदान करने वाले : 402500
- कुल प्रत्याशी : 42
- विजेता : राजीव गांधी, कांग्रेस, प्राप्त मत : 271407

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