आजम खां के पुत्र अब्दुल्ला आजम ने स्वार सीट पर जीत हासिल कर संसदीय राजनीति की शुरुआत की थी, लेकिन दो आयु प्रमाणपत्र और जन्मतिथि में हेराफेरी के आरोप में उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द हो गई। शेष छह सीटों में भाजपा के कुलदीप सिंह सेंगर उन्नाव की बांगरमऊ, डॉ. एसपी सिंह बघेल फिरोजाबाद की टूंडला से, जनमेजय सिंह देवरिया, चेतन चौहान अमरोहा की नौगांव सादात, कमलरानी वरुण कानपुर की घाटमपुर और वीरेंद्र सिंह सिरोही बुलंदशहर सीट से चुनाव जीते थे।
भाजपा के सामने न सिर्फ 2017 में जीती विधानसभा सीटों को अपने कब्जे में बनाए रखने की, बल्कि सपा के कब्जे वाली स्वार तथा मल्हनी को भी जीतकर लोकप्रियता में बढ़ोतरी के दावे को साबित करने की चुनौती है। वहीं, सपा को स्वार तथा मल्हनी में अपना कब्जा बरकरार रखते हुए भाजपा के कब्जे वाली सीटों में भी कुछ को अपनी झोली में डालकर अखिलेश यादव की लोकप्रियता दिन-प्रतिदिन बढ़ने के दावे को साबित करना है।
कांग्रेस अगर उपचुनाव में अपनी उपस्थिति की तरफ लोगों का ध्यान खींचने में कामयाब हो जाती है तो विपक्षी दल के रूप में उसकी तवज्जो बढ़ेगी। प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व पर भरोसा मजबूत होगा। बसपा की बात करें तो भले ही 2017 के विधानसभा चुनाव में वह उपचुनाव वाली सीटों में कहीं न जीती हो लेकिन मल्हनी में वह अच्छा प्रदर्शन करती रही है।
इस समय जौनपुर से बसपा का ही सांसद है। पिछले लोकसभा चुनाव में मल्हनी में बसपा ने काफी वोट हासिल किए थे। यह बात दीगर है कि तब सपा और बसपा गठबंधन करके मैदान में थीं। पर, सांसद होने के नाते मल्हनी में बसपा के सामने भी बेहतर प्रदर्शन की चुनौती है।
भाजपा ने अपने कब्जे वाली छह सीटों पर चुनावी मंथन शुरू करने के साथ ही संगठन से लेकर सरकार के कुछ प्रमुख चेहरों को इन सीटों पर बतौर प्रभारी कमल खिलाने की जिम्मेदारी देने का फैसला किया है। इनकी जल्द ही तैनाती हो जाएगी। सपा के कब्जे वाली मल्हनी और स्वार सीट पर खास मंथन हो रहा है।
पार्टी के रणनीतिकार दोनों सीटों पर ऐसे चेहरों को उतारना चाहते हैं जो स्थानीय समीकरणों में अपनी पकड़ व पहुंच के जरिए वोट बढ़ाकर जीत के आंकड़े तक पहुंच सकें। पिछले दिनों निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद 2017 में मल्हनी में सपा को कड़ी टक्कर देने वाले धनंजय सिंह को लेकर भाजपा के प्रमुख नेता से मिले थे।
हालांकि अभी यह कहना मुश्किल है कि निषाद पार्टी के जरिये आपराधिक छवि के धनंजय सिंह की पीठ पर भाजपा हाथ रखेगी या नहीं। जहां तक बसपा की बात है तो उसने भी कुछ सीटों पर प्रभारी बना दिए हैं। सपा भी जल्द ही कुछ नेताओं को उपचुनाव वाले क्षेत्रों में लगाएगी।