समाजवादी पार्टी ने साल 2013 के सफर की शुरुआत लोकसभा चुनाव 2014 की चुनौतियों से पार पाने के भरोसे के साथ की। लैपटॉप वितरण का काम आगे बढ़ा।
अल्पसंख्यकों का भरोसा हासिल करने की दिशा में भी काम हुए। प्रमोशन में आरक्षण खत्म करके संगठन और सरकार दोनों तरफ से इस धारणा को तोड़ने की कोशिश भी हुई कि सपा सिर्फ पिछड़ों व अल्पसंख्यकों की हित संरक्षक है।
संगठन के एजेंडा पर सरकार काम करती भी दिखी। 17 अति पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा।
छोटे स्तर पर ही सही, लेकिन सहकारी ग्राम्य विकास बैंक के कर्जदार किसानों के 50 हजार रुपये तक के कर्ज माफ किए गए। खाद-बीज की किल्लत को लेकर हंगामे के स्वर नहीं सुनाए दिए।
पर, अपनों के ही चलते इन अच्छे कामों पर भी पानी फिर गया। समय बीतने के साथ न सिर्फ सरकार, बल्कि संगठन की साख को लेकर सवाल खड़े होने लगे।
साल के अंत के साथ एक सवाल और लोगों को सालने लगा है कि पार्टी में मुलायम का वह दबदबा नहीं रह गया है, सो उनकी हिदायतों का भी असर नहीं दिख रहा।
कुछ नेताओं के बयानों से तो कुछ सरकार के कामों और गाड़ियों पर लालबत्ती तथा सपा का झंडा लगाने वालों की चाल-ढाल सरकार व संगठन दोनों के लिए मुसीबत बन गई।
सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव सावधान और सक्रिय हुए। सरकार को हिदायत भी दी और सलाह भी। पार्टी के लोगों को मर्यादा में रहने का पाठ पढ़ाया। इसके बावजूद गाड़ी पटरी पर आती नहीं दिखी।
पद वालों ने बढ़ाई परेशानी जिन्हें कुछ नहीं मिला था वे तो मुसीबत बनते ही रहे, पद पाने वालों ने भी सरकार की परेशानी बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मो. आजम खां सरकार में होने के बावजूद सपा की साख के शत्रु बने नजर आए।
सपा ने मुस्लिम सम्मेलन किया तो उन्होंने इससे किनारा कर यह जता दिया कि पार्टी खेमों में बंटी है। आगरा में राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में उन्होंने जाने की जरूरत नहीं समझी।
गाजियाबाद में हज हाउस के लिए वित्त विभाग से नाराजगी जताते हुए पत्र लिखकर उन्होंने सरकार के अल्पसंख्यक हितैषी चेहरा दिखाने की कोशिशों पर पानी फेरने की कोशिश की।
औरैया के जिलाध्यक्ष रामबाबू यादव, लखनऊ के नटवर गोयल और गोरखपुर के केसी पांडेय जैसे कई चेहरे सरकार की किरकिरी का कारण बने। कानून-व्यवस्था को लेकर भी मुलायम की चिंता दूर नहीं हो पाई।
उनका यह बयान, ‘मैं मुख्यमंत्री होता तो 15 दिन में कानून-व्यवस्था ठीक कर देता’ सपा सरकार की साख के लिए सवाल बना।
दूर नहीं हो पाई चिंता जनवरी से दिसंबर आ गया। पर, पार्टी के लोगों की चाल, चरित्र व चिंतन को लेकर मुलायम की चिंता दूर नहीं हो पाई। सुबूत है, हाल में उनकी यह चेतावनी कि गुंडई करने वालों को पार्टी से निकाल बाहर कर दूंगा।
पर, हाल देखिए कि जिस दिन मुलायम ने यह चेतावनी दी, उसी दिन बलिया में सपा के एक विधायक के पुत्र व गांव वालों में मारपीट हो गई। यह सिलसिला निरंतर जारी है।
गोंडा में एक कांग्रेसी को सपाइयों ने जबरिया निर्वस्त्र कर घुमाया। रायबरेली में भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला बोला। आगरा के एक सपा विधायक पर एक लड़की को घर में जबरिया रखने का आरोप सामने आया।
गुंडई पर चेतावनीजनवरी 2013 सपा कार्यकर्ताओं की सरकार के प्रति नाराजगी लेकर आई। सत्ता में साढ़े नौ महीने का सफर पूरा कर चुकी सरकार से संगठन के लोगों के शिकवे सार्वजनिक होने लगे।
शिकायतें सामने आईं कि अधिकारी तो अधिकारी, मंत्री भी पार्टी के लोगों की बात नहीं सुनते। चिंतित मुलायम ने संगठन और सरकार के बीच संवाद बहाली के लिए कई बैठकें कीं।
मंत्रियों व अधिकारियों को चेताया कि संगठन के लोगों के काम न हुए तो वे अपने पदों पर नहीं रह पाएंगे। पर, मामला नहीं बना।
मुलायम सिंह यादव और प्रदेश सरकार के काबीना मंत्री मो. आजम खां ने कार्यकर्ताओं को संभालने की कोशिश करते हुए कहा कि बसपा ने अपने शासन में अधिकारियों-कर्मचारियों की आदत बिगाड़ दी है।
उसे ठीक करने में वक्त लग रहा है। कहा, कार्यकर्ता अधिकारियों का स्टिंग ऑपरेशन करें। आजम बोले, अधिकारी व कर्मचारी डंडे की भाषा समझने के आदी हैं। ये चाबुक चलाने पर काम करते हैं।
पर, संगठन और सरकार में शीतयुद्ध बंद नहीं हो पाया। मुलायम ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को कार्यकर्ताओं का काम न सुनने वालों पर कार्रवाई की हिदायत दी।
गांवों का दौरा करने और दो-चार को निलंबित करने का निर्देश दिया। जांच बैठाने को कहा। पर, मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। सपा मुखिया पूरे साल पार्टी का चेहरा पाक-साफ बनाने की फिक्र से ही जूझते रहे।