बलिया वाले चौधरी साहब एक बार फिर ‘सरकार’ की गुडबुक में शामिल होने के लिए हाथ-पांव मार रहे हैं।
‘सरकार’ उन्हें भाव ही नहीं दे रहे। विधानसभा सत्र के अंतिम दिन ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने’ वाली कहावत तब सटीक बैठी जब खां साहब को कहीं जाना पड़ा और चौधरी साहब को लंबे समय बाद ‘सरकार’ के बगल में बैठने का मौका मिल गया।
मौका मिले और चौधरी साहब अपनी विद्वता न दिखाएं, यह हो नहीं सकता। संसदीय ज्ञान में पारंगत होने का गुमान और हर मामले में मशविरा देना उनकी फितरत में शामिल है।
चुनाव में उन्हें चित करने वाले विपक्ष के एक सदस्य ने उन्हें छेड़ क्या दिया, चौधरी साहब हत्थे से उखड़ गए।
सदस्य के लिए आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करने के साथ-साथ यह भी बताने में पीछे नहीं रहे कि जिस मुकाम पर वह हैं, वहां तक उन्हें (विपक्ष के सदस्य) पहुंचने में अभी वक्त लगेगा। यानी चौधरी साहब ने खुद अपनी काबिलियत बयां कर दी।
चौधरी साहब की पार्टी के लोग ही कह रहे हैं कि एक दिन मौका क्या मिला, करा दी फजीहत। ऐसा बोलने की जरूरत ही क्या थी कि माफी मांगनी पड़े। आदत से मजबूर हैं। उन्हीं के आजू-बाजू वाले कहने लगे हैं नंबर बढ़वाने की फितरत कहीं उल्टी न पड़ जाए।