अल्पसंख्यक विभाग के एक अफसर हैं, जो अपनी नाकामी का ठीकरा अक्सर मातहतों पर फोड़ देते हैं। उनकी इस आदत से मातहत परेशान हैं।
मातहत चाहे जितनी भी मेहनत से फाइल तैयार करें, साहब को तो उसमें कलम चलानी ही है। कुछ न कुछ लिखकर फाइल लौटा देते हैं। उनकी इस आदत का नतीजा है कि वे खुद भी विभाग में अपना प्रदर्शन बेहतर नहीं कर पा रहे हैं।
इस कारण वे महकमे के सबसे बड़े अधिकारी से आए दिन डांट भी खाते हैं। सफाई में साहब अपने खराब प्रदर्शन के लिए मातहतों को ही जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
मातहतों ने जब उनकी पोल खोलनी शुरू की, तो उन्होंने दबाव का दूसरा रास्ता अपना लिया। अब वे सुबह आकर उपस्थिति रजिस्टर मंगा रहे हैं। देरी से आने वाले मातहतों की एक सूची बनाकर विभागीय मुखिया को दे रहे हैं।
मुखिया भी साहब की आदत को समझ रहे हैं। इसलिए वे कुछ भी नहीं बोल रहे।
दफ्तर के हाल ये हैं कि महकमे के चार अनुभागों में मात्र एक ही अफसर हैं, खाली जगहों पर कोई आना भी नहीं चाहता है। यही हाल रहा तो सभी अनुभाग खाली साहब!