बदले राजनीतिक हालात में अखिलेश पर काफी दबाव है। मुलायम सिंह चाहते हैं कि पार्टी से छिटके समाजवादी नेताओं को फिर से साथ लाया जाए और परिवार की एका का संदेश भी जनता में जाए। इन कदमों का विधानसभा चुनाव में ज्यादा असर पड़ेगा।
वे चाहते हैं कि शिवपाल की ससम्मान वापसी भी हो। हालांकि, सपा नेताओं का कहना है कि शिवपाल अभी भी सपा में हैं। इससे उम्मीद है कि सपा छोड़कर दूसरे दलों में गए कुछ नेताओं की पार्टी में जल्दी ही वापसी हो सकती है।
कुछ सपा नेताओं का मानना है कि अब जमीनी स्तर पर काम करना होगा। चुनावी रणनीति सिर्फ कागजों पर कामयाब नहीं होने वाली है। जिनके लिए सामाजिक न्याय की बात की जा रही है, उन्हें इसकी जानकारी हो और उनकी निचले स्तर तक संगठन में भागीदारी भी होनी चाहिए।
बसपा के गठबंधन से अलग होने के बावजूद रालोद से सपा की दोस्ती कायम रह सकती है। रालोद ने कहा भी है कि उनका गठबंधन सपा से हुआ था और यह जारी रहेगा। सुभासपा, जनवादी पार्टी जैसे दलों से नजदीकियां बढ़ सकती हैं। इन दलों का खास जातियों में प्रभाव है।
कुछ सामाजिक संगठन भी सपा के करीब आ सकते हैं। भाजपा सरकार के खिलाफ मोर्चा बनाने के लिए वामपंथी दलों व किसान संगठनों का भी सहयोग लिया जा सकता है।