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'थोड़ी सियासत थोड़ा शराफत' से मजबूत हुए अखिलेश

Wed, 06 Jan 2016 05:32 AM IST
कुमार भवेश चंद्र/अमर उजाला, लखनऊ
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साल की शुरुआत के साथ ही प्रदेश में 2017 में होनेवाले विधानसभा चुनाव की आहट तेज होती जा रही है। सत्ता की रेस में शामिल प्रमुख पार्टियों ने अपनी चुनावी लड़ाई को जमीन पर उतारने की तैयारी कर ली है।
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सत्ताधारी दल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को आगे कर एक बार फिर अपना दांव चल दिया है। साल के पहले ही दिन ‘अखिलेश वंस अगेन’ की धमक सुनाई दी। मुमकिन है ‘अखिलेश वंस अगेन’ का यह जुमला बिहार में कामयाबी की नई इबारत लिख चुके नीतीश कुमार के हिट चुनावी नारे, ‘बिहार में बहार हो... नीतिशे कुमार हो’ से प्रेरित हो।

अखिलेश यादव को केंद्रित कर लिखा गया सपा का चुनावी गीत, ‘तरक्की का शुभारंभ...प्रगति का श्रीगणेश..अखिलेश..अखिलेश’ भी लॉन्च हो चुका है। गांव-गांव अखिलेश के नाम से सपा का चुनावी अभियान कस्बों और गांवों की ओर रुख कर चुका है।
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इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले तीन-साढे़ तीन साल में अखिलेश यादव अपनी पार्टी का एक मजबूत और भरोसेमंद चेहरा बनकर उभरे हैं। प्रदेश में चार और साढ़े चार मुख्यमंत्री की थ्योरी के बावजूद अखिलेश लगातार अपना काम करते रहे।
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कामयाबी गिनाने के लिए है बहुत कुछ

सरकार को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह की फटकार को भी उन्होंने बहुत ही सहजता से लिया। पार्टी के मंत्रियों का एजेंडा चाहे जो रहा हो, अखिलेश का एक ही एजेंडा था-अपना काम करते रहना।

प्रदेश के विकास के लिए कुछ महात्वाकांक्षी योजनाओं के प्रति उनकी गंभीरता और प्रशासनिक प्रयास का ही नतीजा है कि जब वे अगले चुनाव की ओर बढ़ रहे हैं तो अपनी कामयाबी गिनाने के लिए उनके पास बहुत कुछ है।

कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर उनकी सरकार को फेल बताया गया। शुरुआती सालों में यह उनकी सरकार के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने भी आया। मुजफ्फरनगर दंगे ने तो सरकार की चूल हिला दी। एक बार तो अखिलेश का भी आत्मविश्वास डगमगा गया।

विधानसभा में सार्वजनिक तौर पर उन्होंने इसे अपने सियासी कॅरिअर के लिए चिंताजनक बताया था। पर, धीरे-धीरे ही सही, अखिलेश ने इस दिशा में भी कुछ ठोस कदम उठाए हैं।

बुनियादी क्षेत्र के विकास पर रहा पूरा जोर

पोस्टिंग में सियासत तो खूब हुई, पर संसाधनों के अभाव से जूझ रही यूपी पुलिस को सुविधाओं से लैस करने की दिशा में भी काम हुए हैं। बुनियादी क्षेत्र के विकास पर अखिलेश सरकार का पूरा जोर रहा है।

लखनऊ में मेट्रो, आईटी सिटी, स्टेडियम, हाई प्रोफाइल अस्पतालों के निर्माण की पहल से विकास का आगाज दिख रहा है। कलाप्रेमियों-साहित्यकारों-खिलाड़ियों के प्रति सम्मानभाव की झलक भी इस सरकार में दिखाई दी।

सवाल यश भारती की पुरस्कार राशि बढ़ाने का हो या फिर खिलाड़ियों के प्रोत्साहन-मदद का, सरकार का रवैया सकारात्मक ही माना जाएगा।

जनता दर्शन के अपने वादे पर भले ही वे लगातार अमल नहीं कर पाए हों, लेकिन कई मौकोंपर आम आदमी को सीधे मदद पहुंचाने का मुख्यमंत्री का जज्बा दिखाई दिया। लेकिन इन खूबियों और कामयाबियों के बीच अखिलेश की कमजोरी भी सामने आती रही।
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इन मामलों में कमजोर साबित हुए अखिलेश

पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वे अपने कार्यकर्ताओं को आलाकमान के प्रकोप से बचाने के लिए सत्याग्रह करते तो दिखाई दिए, लेकिन कार्यकर्ताओं को सार्वजनिक रूप से शक्ति प्रदर्शन से बचने की नसीहत देते हुए उतने गंभीर कभी नहीं रहे। यहां तक कि अपने बड़बोले मंत्रियों पर भी नरम ही दिखाई दिए।

पार्टी के भीतर दबंगों और बाहुबलियों के असर को कम करने को लेकर भी उनका ठोस काम सामने नहीं आया है। मंत्रिमंडल के पुनर्गठन में भी उनका समझौतावादी रुख सामने आया।

लेकिन अच्छी बात ये रही कि थोड़ी सियासत और थोड़ा शराफत के साथ चुनाव की ओर आगे बढ़ रहे अखिलेश यूपी की सियासत का प्रमुख चेहरा बन चुके हैं और शायद उम्मीद भी। 2017 के चुनाव में बसपा और भाजपा से उनकी लड़ाई रहेगी।

बसपा के चेहरे के रूप में मायावती के सामने वे कतई कमजोर साबित नहीं होंगे। रही बात भाजपा की, तो अब तक वह यह तय नहीं कर कर सकी कि किस चेहरे को आगे करके यूपी के रण में कूदेगी या फिर बिहार फॉर्मूले पर ही कायम रहेगी।
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