क्या लैपटॉप देने की घोषणा से जुड़ने वाले युवा लैपटॉप पाने के बाद भी सपा सरकार के साथ बने रहे? इस पर मंथन जारी है।
पहले जावेद उस्मानी को मुख्य सचिव और अब रिजवान अहमद को सूबे का डीजीपी बनाने का प्रयोग तथा ‘हमारी बेटी-उसका कल’।
जैसी अल्पसंख्यकों को लुभाने वाली योजनाएं क्या मुसलमानों में पार्टी के प्रति भरोसा बरकरार रख पाईं? क्या कर्ज माफी और मुफ्त सिंचाई से किसान निहाल हुए?
क्या मुफ्त पढ़ाई-मुफ्त दवाई-मुफ्त जांच व ऑन डिमांड एंबुलेंस सेवा से आम लोगों ने राहत महसूस की? क्या बेरोजगारी भत्ता से बेरोजगारों ने राहत महसूस की और शिक्षामित्रों की भीड़ साइकिल को रफ्तार देने के काम आई?
वित्तीय वर्ष 2014-15 की पहली तिमाही का लेखानुदान लाकर सरकार ने साफ संकेत दे दिया है कि वह लोकसभा चुनावों में इन प्रयोगों का ‘कमाल’ देखने के बाद ही पूर्ण बजट तैयार करने वाली है।
वित्तीय मामलों के जानकार शासन के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं कि लोकसभा चुनाव एक तरह से प्रदेश सरकार की आगे की दिशा भी तय करने वाला होगा। सरकार देखगी जनकल्याणकारी योजनाओं से जनता कितनी संतुष्ट हुई।