लोकसभा चुनाव के बाद प्रदेश में बड़े प्रशासनिक फेरबदल की सुगबुगाहट है। चुनाव आचार संहिता समाप्त होते ही सरकार ने अफसरों को इधर से उधर करने का मूड बना लिया है।
आधे से ज्यादा जिलों के डीएम व पुलिस कप्तानों के साथ-साथ प्रमुख सचिव व सचिव स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारियों में बदलाव किया जा सकता है।
चुनाव बाद सरकार अपने विकास एजेंडे को रफ्तार देने की रणनीति भी तैयार कर रही है।
प्रशासनिक अफसरों का एक खेमा भाजपा के बड़े नेताओं के भी संपर्क में है ताकि अगर केंद्र में सरकार बनती है तो वहां तैनाती करा सकें। चर्चा तो मुख्य सचिव जावेद उस्मानी के भी चुनाव बाद केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने की चल रही है।
लोकसभा चुनाव से पहले सरकार ने अपने हिसाब से अफसरों की तैनाती करके बिसात बिछाई थी लेकिन चुनाव की प्रक्रिया शुरू होते ही चुनाव आयोग ने सरकार की ‘गुडबुक’ के अफसरों को हटाकर निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने के लिए नई बिसात बिछा दी।
इस चुनाव में आयोग ने 26 डीएम, 28 पुलिस कप्तान, तीन डीआईजी व दो दर्जन पीसीएस अधिकारी बदले। चुनाव बाद इन सभी को एक बार फिर अहम तैनाती मिलनी तय मानी जा रही है।
जहां तक शासन का सवाल है तो ज्यादातर विभागों में आदर्श आचार संहिता की आड़ में कामकाज लगभग बंद है। अफसरों को भी चुनाव के नतीजों का इंतजार है।
केंद्र में एनडीए की सरकार बनने पर बहुत से अफसर दिल्ली जाने की संभावनाएं तलाशने में भी जुटे हैं। हाल ही में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य के पद पर तैनात प्रवीर कुमार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए हैं।
उनका कार्यभार फिलहाल प्रमुख सचिव ऊर्जा संजय अग्रवाल संभाल रहे हैं। आचार संहिता खत्म होने के बाद प्रमुख सचिवों के बीच विभागों का नए सिरे से बंटवारा होने की भी संभावना है।
बातचीत में प्रशासनिक अधिकारी मानते भी हैं कि चुनाव के नतीजों का जितना इंतजार प्रत्याशियों, पार्टियों, समर्थकों और जनता को है उतना ही ब्यूरोक्रेसी को भी।
इसकी वजह यह भी है कि बहुत से अधिकारियों का भविष्य प्रदेश में सत्तारूढ़ दल के प्रदर्शन से जुड़ा है। जहां तमाम अफसरों पर गाज गिर सकती है वहीं कुछ को इनाम से भी नवाजा जा सकता है।