‘पापा ने पहले साथ छोड़ा और अब कहते हैं मुकदमा वापस ले लो’। ‘हर पेशी पर मेरे चेहरे पर तेजाब फेंका जाता है...’ इससे कहीं ज्यादा दर्द में जी रही हैं वो...
न्याय का इंतजार नहीं हो रहा खत्म
‘मैं रोती हूं...बिलखती हूं। न्याय की जिसे चौखट कहते हो तुम, उसी दर पर...। हर तारीख पर मेरा गुनहगार मेरे सामने से मुस्कुराता निकल जाता है...अकड़ता हुआ...।
... हर बार मेरा जख्म हरा हो जाता है। वह घाव... वह दर्द की कराह... आखिर तुम्हें क्यों नहीं दिखाई और सुनाई देते? बताओ? ...मैं इस सिस्टम पर रोऊं नहीं तो क्या करूं... चीखूं नहीं तो क्या करूं...। याद आते हैं वो दिन, जब मां मेरे चेहरे को देख इतराया करती।
....मेरे बालों को करीने से सजाया करती। मुझमें अपना अक्स देखा करती...। उसे इस जले चेहरे को लेकर क्या जवाब दूं मैं...। उस आईने को क्या जवाब दूं...। है कोई दिलासा तुम्हारे पास...।
पर यह सब कहां दिखता है सिस्टम को...। पर मुझे जो दिखता है... जिसे तुम न्याय कहते हो, उसको पाने में अब तक...हर तारीख...हर पेशी पर हर बार मेरे चेहरे पर तेजाब फेंका जाता है...।’
ये है उन तेजाब पीड़िताओं का दुख जो आज तक न्याय की आस में आज भी सिस्टम के हाथ की कठपुतली बनी हुई हैं। यहां जानें कुछ केसेज, पीड़िताओं की जुबानी...
शहीद पथ एसिड अटैक (1 फरवरी 2014)
रियाज अहमद चचेरा मामा था। चाकू का डर दिखाकर कानपुर रोड निवासी 17 साल की रेशम (परिवर्तित नाम) को किडनैप कर लिया। शहीद पथ ले गया और उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया।
तेजाब की जलन से रेशम चिल्ला उठी, फिर अचानक बंद आंखों से ही रियाज पर टूट पड़ी। एक ऑटो को रुकवाकर मदद मांगी। लोग जुटने लगे तो रियाज भाग खड़ा हुआ। पुलिस ने रेशम को अस्पताल पहुंचाया।
रेशम को उसकी बहादुरी के लिए प्रधानमंत्री 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) को नेशनल ब्रेवरी अवॉर्ड से सम्मानित करेंगे।
रेशम कहती है कि पोक्सो एक्ट में केस दर्ज हुआ। आरोपी पर रासुका भी लगा। 10 महीने हो चुके हैं। एक साल में तो केस का निपटारा हो जाना चाहिए।
रेशम कहती है कि इलाज पर परिवार सात लाख रुपए खर्च कर चुका है। अब और ज्यादा कहां से लाएं? एसजीपीजीआई में तो कह दिया कि मुफ़्त इलाज नहीं कर सकते।
हनुमान सेतु मंदिर एसिड अटैक (6 अगस्त, 2013)
सात साल पहले एक लड़की दर्शन करने हनुमान सेतु मंदिर जा रही थी। उसी दौरान पेपर मिल महानगर कॉलोनी के सिरफिरे 55 साल के विष्णु नारायण शिवपुरी ने तेजाब फेंक दिया।
हालांकि उसका चेहरा तो जलने से बच गया, लेकिन मन में गहरे घाव कर गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आरोपी को जेल में डाल दिया गया। स्थानीय कोर्ट ने उसे 7 साल की सजा भी सुनाई।
हालांकि पीड़िता आज भी खुद को उसकी बीवी न होने की लड़ाई लड़ रही है। पीड़िता के मुताबिक, शिवपुरी की देहरादून में उसके पिता से दोस्ती हो गई थी। घर आना जाना रहा। उसकी पढ़ाई के लिए शिवपुरी पीड़िता को बेटी बनाकर लखनऊ ले आया।
फिर जबरन शादी करने का दबाव बनाने लगा। परेशान होकर पीड़िता देहरादून लौट गई। तब शिवपुरी ने कोर्ट में फर्जी दस्तावेज लगाकर उसे पत्नी बताने की कोशिश भी की। दबाव काम न आया तो उसने तेजाब फेंक दिया।
मूलरूप से देहरादून निवासी पीड़िता का कहना है कि मुझे अपनी पत्नी बताने वाला शिवपुरी सात साल में फैमिली कोर्ट में इसका सुबूत नहीं दे सका।
हाईकोर्ट मामले को तय समय में निबटाने के आदेश भी दे चुका है। लेकिन आज भी शिवपुरी का वकील कहता है, साक्ष्य जुटा रहा हूं। ... और कोर्ट उसे अगली तारीख दे देती है।
आलमबाग एसिड अटैक (17 जून 2012)
‘अब तो पापा ने भी साथ छोड़ दिया...। मुझ पर तेजाब डालने वाले से वो मिलते हैं। दबाव डालते हैं कि मुकदमा वापस ले लो।’ यह कहते कविता के आंखों में बेबसी तैर जाती है।
जून 2012 को आलमबाग में उस पर शोहदे हसनैन उर्फ फहद ने तेजाब डाल दिया था। कविता कहती हैं, मैं तेजाब के दर्द से बिलखती रही, पुलिस मुकदमा दर्ज करने के बजाय सीमा विवाद में उलझी रही। बहरहाल मुकदमा दर्ज हो गया।
वह जेल भी गया। पर थोड़े ही दिनों में जमानत पर बाहर आ गया। फिर से धमकाने लगा। इस बीच पिता ने मुंह मोड़ लिया। भाई को साथ लेकर घर छोड़ दिया। किराए पर भी कोई कमरा नहीं देना चाहता।
दोस्त के यहां भाई के साथ रहती हूं। अब पापा कहते हैं मुकदमा वापस ले लो। दुख होता है। पर मैंने साफ मना कर दिया। पिता ने भले साथ छोड़ दिया, कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी मदद से मैं ये लड़ाई लड़ पा रही हूं।
सदरौना काकोरी एसिड अटैक (15 फरवरी 201)
स्कूल पढ़ाने जा रही सदरौना के एक स्कूल में शिक्षामित्र शबीना (परिवर्तित नाम) पर उसके ही मौसा ने तेजाब फेंक दिया। चेहरा, गर्दन, बांह बुरी तरह जल गया। घटना को सालों हो गए पर वह उस खौफ से आज तक उबर नहीं पाई।
स्कूल जाना तो नहीं छोड़ा पर अकेले नहीं जाती। पूछने पर सिर्फ यही कहती है उस घटना को दोबारा याद नहीं करना चाहती। उसका परिवार भी अब इस मामले की पैरवी करना बंद कर चुका है।
उनका कहना है कि अब जो भी कोर्ट में होगा देखा जाएगा। शबीना का भाई कहता है कि हम पता करकेभी क्या करें? जब कुछ होना ही नहीं है।
घटना से पहले शबीना की शादी की चर्चा चल रही थी। जो नहीं हो सकी। कुरेदने पर शबीना कहती हैं, जिसने मेरा यह हाल किया उसको आज तक सजा नहीं मिल सकी।
मेरी पूरी जिंदगी बिखर गई। सरकार कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं करती। पुलिस भी शुरुआत से ही टालमटोल का रवैया अपनाती रही। मुझे तो किसी मदद की उम्मीद नहीं।
बोले सर्जन, एसिड अटैक मतलब स्थायी विकृति
केजीएमयू के प्लास्टिक सर्जरी विभाग में एसिड अटैक के हर साल दो-तीन केस आते हैं। इनमें ज्यादातर युवतियां ही होती हैं।
तेजाब से जले मरीजों का इलाज करने वाले डॉ. अरुण कुमार सिंह कहते हैं, किसी की विकृत मानसिकता पलभर में एक जिंदगी को तबाह कर देती है। एसिड गिरने से केवल त्वचा ही नहीं जलती।
स्थायी विकृति आ जाती है। आंख की रोशनी जाना, कान गल जाने से लेकर होंठ, गाल, गर्दन तक विकृतियां आ जाती हैं। बोलने, आंख बंद करने तक में समस्या का सामना करना पड़ता है।
वह कहते हैं, कितनी भी कोशिश कर ली जाए, युवती को हम उसका असली चेहरा वापस नहीं दे सकते। महंगा है इलाज- एक बार एसिड चेहरे पर गिरने के बाद 4-10 साल तक इलाज चलता है।
क्रिमिनल लॉ में संशोधन में आजीवन जेल
इसमें तय समय पर सर्जरी होती रहती हैं। लाखों रुपये खर्च होता है। औसत ग्राफ्टिंग कराने और फ्लैप कराए जाने में 6-10 लाख रुपये तक खर्च हो जाते हैं। इसके बाद भी 40-50 प्रतिशत तक रिकवरी ही संभव हो पाती है।
जेएस वर्मा कमेटी की रिपोर्ट के बाद 2013 में क्रिमिनल लॉ में संशोधन किया गया।
नए कानून के सेक्शन 326ए के तहत एसिड अटैक करने वाले को 10 साल से लेकर आजीवन कारावास हो सकती है। इसके अलावा उपचार पर आने वाले खर्च केबराबर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
वहीं सेक्शन 326बी में एसिड अटैक के प्रयास केमामले में पांच साल और अधिकतम सात साल की जेल हो सकती है। इसके साथ ही जुर्माना भी लगाया जा सकता है।