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लोहिया संस्थान में रीढ़ की हड्डी बिना काटे दिलाई स्लिप डिस्क के दर्द से मुक्ति

Tue, 25 Oct 2016 03:59 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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ऑपरेशन के बारे में जानकारी देते डॉ मो.कैफ - फोटो : amar ujala
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कुर्सी पर बैठकर कई घंटे तक लगातार काम करने वाले हों या कोई खिलाड़ी, झुककर काम करने वाले हों या लंबी ड्राइविंग करने वाले। कमर में दर्द की समस्या युवाओं में तेजी से बढ़ रही है। मेडिकल की भाषा में इस बीमारी को स्लिप डिस्क कहा जाता है। 
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इस दर्द को नजरअंदाज करने वाले लोगों की जिंदगी मुश्किल में पड़ सकती है और पैरों की ताकत कम होने के साथ टॉयलेट पर नियंत्रण तक खत्म हो सकता है। डॉक्टर इसका कारण बिगड़ती लाइफ स्टाइल बता रहे हैं। 

लोहिया संस्थान में स्लिप डिस्क के मरीजों को छोटे से ऑपरेशन से राहत दिलाई जा रही है। खास बात यह है कि इस ऑपरेशन में रीढ़ की हड्डी को काटा नहीं जाता है और छोटे से चीरे से ही काम हो जाता है। वहीं, ऑपरेशन के 24 घंटे के भीतर मरीज को डिस्चार्ज कर दिया जाता है।
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कन्नौज के सुरेश (35) को कमर में असहनीय दर्द की शिकायत थी। सीटी स्कैन में पता चला कि उसे स्लिप डिस्क की समस्या हो गई है। लोहिया संस्थान के न्यूरो सर्जन डॉ. मो. कैफ ने बताया कि पहले स्लिप डिस्क से पीड़ित मरीज को दर्द से निजात दिलाने के लिए ओपन सर्जरी की जाती थी।

इसमें लिगामेंट, हड्डी को काटकर मांस के उस हिस्से को निकाला जाता था, जिसकी वजह से नस दबी रहती थी। इस प्रक्रिया में रीढ़ की हड्डी के कुछ हिस्से को काटने के साथ मांसपेशियों को काटना पड़ता था, जिससे मरीज को तकलीफ होती थी। 

मेडिकल की भाषा में इस प्रक्रिया को लैमीनैक्टमी कहा जाता था। मगर, अब मरीज को एमईडी (मजहर इंडोस्कोपिक डिवाइस) टेक्निक की मदद से ऑपरेशन कर आराम दिया जा रहा है। 

मेडिकल की भाषा में इसे इंडोस्कोपिक डिस्कएक्टमी कहा जाता है। डॉ. कैफ ने बताया कि इस टेक्निक में स्पाइन के बीच मौजूद लमाइना (रीढ़ की हड्डी का एक छेद) के पास से दो सेमी का छेद बनाया जाता है। इंस्ट्रूमेंट्स की मदद से उस छेद को चार सेमी तक बड़ा किया जाता है।
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सर्जरी में चूक तो पंजे की ताकत खत्म

मरीज सुरेश - फोटो : amar ujala
इसके बाद एक पोर्ट से कैमरा तो दूसरे से सर्जिकल ब्लेड को उस हिस्से तक पहुंचता है। इसी दौरान रूट डिस्ट्रक्टर पोर्ट की मदद से नस को खींचा जाता है, जिसके बाद स्लिप डिस्क यानी मांस के उस हिस्से को काटकर अलग कर दिया जाता है, जिसकी वजह से दर्द हो रहा होता है। डॉ. कैफ बताते हैं कि 45 मिनट की सर्जरी में मरीज को असहनीय दर्द से मुक्ति मिल जाती है।

डॉ. कैफ के मुताबिक, फायदेमंद होने के साथ-साथ यह सर्जरी बहुत क्रिटिकल भी है, क्योंकि इसमें जरा-सी चूक होने पर नर्व रूट को नुकसान होता है और पंजे की ताकत पल में जा सकती है।

वो बताते हैं कि ऑपरेशन के दौरान किसी तरह की कोई चूक न हो इसके लिए कैमरा व पोर्ट भीतर जाता है तो हाई रिजॉल्यूशन कैमरा और मैग्नीफायर की मदद से कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर रखी जाती है, जिससे मरीज का सफल ऑपरेशन हो और किसी तरह की दिक्कत का सामना न करना पड़े।

डॉ. कैफ बताते हैं कि कमर दर्द की समस्या आजकल 80 फीसदी लोगों में है। हालांकि, इनमें से 20 फीसदी को ही ऑपरेशन की जरूरत पड़ती है। इससे बचने के लिए बैठने के तरीके को दुरुस्त रखना चाहिए।

कुर्सी पर ज्यादा समय काम करते हैं या बाइक ज्यादा चलाते हैं तो पीठ सीधी रखकर बैठना चाहिए। झुककर बैठने से समस्या बढ़ जाती है। दर्द होने पर उसे नजरअंदाज न करें और उचित डॉक्टरी सलाह लें। 

डॉ. कैफ बताते हैं कि राजधानी के किसी भी सरकारी संस्थान में इस ऑपरेशन की सुविधा नहीं है। उन्होंने बताया कि इस ऑपरेशन पर लोहिया संस्थान में करीब तीस हजार रुपये का खर्च आता है।

वहीं, निजी अस्पताल में इस तरह के ऑपरेशन के लिए मरीजों को दो से ढाई लाख की रकम देनी पड़ती है। ऑपरेशन के बाद मरीज को करीब दो महीने तक फॉलोअप में आना पड़ता है। इस सुविधा के बाद अधिक से अधिक रोगियों को ऑपरेशन के लिए इंतजार नहीं करना पड़ेगा। 
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