कुर्सी पर बैठकर कई घंटे तक लगातार काम करने वाले हों या कोई खिलाड़ी, झुककर काम करने वाले हों या लंबी ड्राइविंग करने वाले। कमर में दर्द की समस्या युवाओं में तेजी से बढ़ रही है। मेडिकल की भाषा में इस बीमारी को स्लिप डिस्क कहा जाता है।
इस दर्द को नजरअंदाज करने वाले लोगों की जिंदगी मुश्किल में पड़ सकती है और पैरों की ताकत कम होने के साथ टॉयलेट पर नियंत्रण तक खत्म हो सकता है। डॉक्टर इसका कारण बिगड़ती लाइफ स्टाइल बता रहे हैं।
लोहिया संस्थान में स्लिप डिस्क के मरीजों को छोटे से ऑपरेशन से राहत दिलाई जा रही है। खास बात यह है कि इस ऑपरेशन में रीढ़ की हड्डी को काटा नहीं जाता है और छोटे से चीरे से ही काम हो जाता है। वहीं, ऑपरेशन के 24 घंटे के भीतर मरीज को डिस्चार्ज कर दिया जाता है।
कन्नौज के सुरेश (35) को कमर में असहनीय दर्द की शिकायत थी। सीटी स्कैन में पता चला कि उसे स्लिप डिस्क की समस्या हो गई है। लोहिया संस्थान के न्यूरो सर्जन डॉ. मो. कैफ ने बताया कि पहले स्लिप डिस्क से पीड़ित मरीज को दर्द से निजात दिलाने के लिए ओपन सर्जरी की जाती थी।
इसमें लिगामेंट, हड्डी को काटकर मांस के उस हिस्से को निकाला जाता था, जिसकी वजह से नस दबी रहती थी। इस प्रक्रिया में रीढ़ की हड्डी के कुछ हिस्से को काटने के साथ मांसपेशियों को काटना पड़ता था, जिससे मरीज को तकलीफ होती थी।
मेडिकल की भाषा में इस प्रक्रिया को लैमीनैक्टमी कहा जाता था। मगर, अब मरीज को एमईडी (मजहर इंडोस्कोपिक डिवाइस) टेक्निक की मदद से ऑपरेशन कर आराम दिया जा रहा है।
मेडिकल की भाषा में इसे इंडोस्कोपिक डिस्कएक्टमी कहा जाता है। डॉ. कैफ ने बताया कि इस टेक्निक में स्पाइन के बीच मौजूद लमाइना (रीढ़ की हड्डी का एक छेद) के पास से दो सेमी का छेद बनाया जाता है। इंस्ट्रूमेंट्स की मदद से उस छेद को चार सेमी तक बड़ा किया जाता है।