सत्येंद्र दास संत कबीरनगर के रहने वाले थे। वे बचपन से ही अयोध्या में रहते थे इसलिए उन्हें अपने आसपास धार्मिक माहौल मिला था। अभिरामदास जिन्होंने 1949 में रामजन्म भूमि के गर्भगृह में मूर्तियां रखी थी,उनसे काफी प्रभावित हुए। अभिरामदास जी का सत्येंद्र दास के पिता से संपर्क अच्छा था। सत्येंद्र दास पर धर्म व अध्यात्म का गहरा प्रभाव पड़ा और उन्होंने पिता के समक्ष संन्यासी बनने की इच्छा जताई। पिताजी ने भी कोई विरोध नहीं किया बल्कि उन्हें बहुत खुशी हुई। इसके बाद सत्येंद्र दास जी प्रभु श्रीराम की सेवा के लिए चले गए।
1976 में की अध्यापक की नौकरी
सत्येंद्र दास ने 1975 में संस्कृत विद्यालय से आचार्य में उत्तीर्ण किया और 1976 में उन्हें संस्कृत महाविद्यालय के व्याकरण विभाग में सहायक अध्यापक की नौकरी मिल गई लेकिन अपने काम के साथ वे राम जन्मभूमि में भी आते-जाते थे और पूजा-पाठ से जुड़े कार्यों में अपना योगदान देते रहे। इसी तरह एक समय ऐसा आया कि 1992 में उन्हें राम जन्मभूमि का मुख्य पुजारी बना दिया गया।