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OMG: बच्चे का दिल, आंत और लीवर सब बाहर

Fri, 13 Mar 2015 08:21 AM IST
अतुल अवस्थी/अमर उजाला, बहराइच
इसे कुदरत की मार ही कहेंगे कि बच्चा जन्म ले तो उसका दिल, आंत और लीवर सब बाहर हो। गुरुवार शाम शहर के एक निजी नर्सिंगहोम में एक महिला ने ऑपरेशन के बाद ऐसे ही विकृत बच्चे को जन्म दिया। दो घंटे के ऑपरेशन के बाद डॉक्टर ने मां को तो बचा लिया लेकिन बच्चा सिर्फ 15 मिनट ही सांसें ले सका। चिकित्सक इसे क्रोमोसोम्स में आई गड़बड़ी बता रहे हैं।


सिविल लाइंस क्षेत्र के संजीवनी हॉस्पिटल में गुरुवार शाम श्रावस्ती के इकौना थाना क्षेत्र अंतर्गत बसनेरा बुलाकीपुरवा निवासी जगनारायण की पत्नी अर्चना तिवारी (35) प्रसव पीड़ा से कराहते हुए पहुंची। महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. छाया श्रीवास्तव ने अर्चना का परीक्षण कर ऑपरेशन करने का निर्णय लिया।

शाम पांच से सात बजे तक चले ऑपरेशन के बाद अर्चना ने विकृत बच्चे को जन्म दिया। उसका चेहरा तो सही सलामत था लेकिन छाती के नीचे दिल, आंत और लिवर सब कुछ पेट के बाहर था। नवजात की यह स्थिति देखकर चिकित्सक भौचक रह गए। 15 मिनट तक नवजात ने सांस लीं फिर दम तोड़ दिया।

एक लाख में से एक को होती है ऐसी विकृति

डॉ. छाया ने बताया कि किसी तरह मां को बचाया गया है, वह स्वस्थ है। डॉक्टर ने कहा कि नौ माह पूरा हो चुका था। प्रसव समय पर हुआ है लेकिन नवजात की जो स्थिति दिखी है, कंजेनाइटल डिजीज के दायरे में आती है।

उन्होंने कहा कि क्रोमोसोम्स में गड़बड़ी आने के चलते बच्चे के शरीर का संपूर्ण विकास नहीं हो पाता। ऐसे में गर्भ में बच्चे के शरीर के अंदर के अंग बिना शारीरिक संरचना के ही विकसित हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि एक लाख में अधिकतम एक, दो ऐसे केस सामने आते हैं। मालूम हो कि विकृत बच्चे को जन्म देने वाली अर्चना दो बच्चों की मां है। वह दोनों बच्चे स्वस्थ हैं।

डॉ. छाया श्रीवास्तव ने बताया कि 30 साल के बाद कंजेनाइटल डिजीज की संभावना महिलाओं में बढ़ जाती है। खानपान पर ध्यान न देना, समय से टीकाकरण और परीक्षण न करवाने पर भ्रूण अविकसित या शारीरिक संरचना के विकसित होने की परिस्थितियां बनती हैं।
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अल्ट्रासाउंड से पता लग सकता है विकृतियों का

संजय गांधी पीजीआई के मेडिकल जेनेटिक्स विभाग की हेड प्रो.शुभा फडके का कहना है कि नवजात में पैदाइशी दिल, लिवर और आंत शरीर से बाहर निकलना ‘पेंटालॉजी ऑफ केंट्रल’ कहा जाता है। ये पैदाइशी शारीरिक विकार क्रोमोसोम (गुणसूत्रों) में गड़बड़ी के कारण होती है।

40 हजार में एक बच्चे में ये विकृति हो सकती है। वैसे तो हर 100 में तीन बच्चों को सिर से पैर तक कोई न कोई पैदाइशी विकृति होती है लेकिन पेंटालॉजी ऑफ केंट्रल हजारों तरह की पैदाइशी विकृतियों में से एक और बहुत अधिक नहीं पायी जाती है।

प्रो. शुभा फडके के अनुसार यदि 16 से 20 सप्ताह में गर्भवती मां का ठीक से अल्ट्रासाउंड किया जाए तो इस विकृति को पहचाना जा सकता है। इसके बाद माता-पिता की सहमति से गर्भपात करा दिया जाता है। जिससे मां को भविष्य में होने वाले शारीरिक और मानसिक ट्रॉमा से बचाया जा सके।

उन्होंने बताया कि ऐसी पैदाइशी विकृति वाले बच्चों के खून का नमूना जरूर ले लेना चाहिए। इससे खून की जेनेटिक जांचकर विकृति का कारण पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा मृत बच्चे की एटॉप्सी (पोस्टमार्टम) भी जरूरी होती है। इससे शरीर की अन्य विकृतियों की जानकारी मिल जाती है। इससे माता-पिता को भविष्य में ऐसी विकृतियों वाले बच्चों के जन्म को रोका जा सकता है।
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