दरअसल, प्रदेश में कांग्रेस के कमजोर होने के बाद ब्राह्मणों की पहली पसंद भाजपा रही है। भाजपा से ब्राह्मणों की नाराजगी का फायदा उठाकर पहले भी बसपा और सपा सरकार बना चुके हैं। करीब 14 साल बाद प्रदेश की सत्ता में भाजपा की वापसी में भी ब्राम्हणों की लामबंदी ही मुख्य आधार रहा है।
ऐसे में आप को लगता है कि जिस तरह ब्राह्मणों की नाराजगी मुखर होती रहती है, उसके चलते यदि सहानुभूति के सहारे जगह बना ली जाए तो विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी को फायदा हो सकता है।
राजनीतिक और आर्थिक विश्लेषक प्रो. एपी तिवारी कहते हैं कि आजादी के पहले ही वर्ष 1919 में मांटेग्यू चेम्सफोर्ड सुधार के साथ अंग्रेजों ने संसदीय परिपाटी में जातीय तत्व के समावेश का रास्ता खोल दिया था। उत्तर प्रदेश की बात करें तो चौधरी चरण सिंह से लेकर मुलायम सिंह यादव और कांशीराम सभी ने यही किया।