एक मायने में रामपुर की बाजी भाजपा को लाभ देती ही नजर आ रही है। तंजीन का राज्यसभा का कार्यकाल नवंबर 2020 तक है। भाजपा जीत जाती है तब तो यह उसकी बड़ी सफलता मानी ही जाएगी, पर यदि तजीन जीतती हैं तो उनके त्यागपत्र से खाली होने वाली राज्यसभा सीट पर भाजपा अपने किसी नेता या कार्यकर्ता को भेज सकती है। इससे राज्यसभा में सपा का एक सदस्य और कम हो जाएगा जबकि भाजपा का बढ़ जाएगा। उत्तर प्रदेश से सपा के तीन राज्यसभा सदस्य नीरज शेखर, संजय सेठ और सुरेंद्र नागर पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
उपचुनाव में जलालपुर के समीकरण भी दिलचस्प नजर आ रहे हैं। यहां भाजपा को 1989 से अब तक केवल एक बार विजय मिली जब 1996 में भाजपा से शेरबहादुर सिंह चुनाव लड़े। इस बार भाजपा ने उनके पुत्र डॉ. राजेश सिंह को मैदान में उतारा है।
भाजपा ने 2017 के आम चुनाव में भी राजेश को लड़ाया था, लेकिन बसपा के रितेश पांडेय को कड़ी टक्कर देने के बावजूद लगभग 13 हजार वोटों से हार गए। इस बार भाजपा के लिए उम्मीद इसलिए दिख रही है क्योंकि शेरबहादुर सिंह या उनके परिवार का कोई व्यक्ति जब भी भाजपा से लड़ा तो इस पार्टी का वोट सम्मानजनक संख्या तक पहुंचा। अन्यथा भाजपा प्रत्याशियों को मिले मतों की संख्या कम रही।
भाजपा के लिए राहत की बात यह भी है कि पिछले चार चुनावों से इस सीट पर कभी सपा तो कभी बसपा से शेरबहादुर के खिलाफ मुख्य मुकाबले में रहने वाले राकेश पांडेय के परिवार का कोई सदस्य नहीं लड़ रहा है। राकेश के पुत्र रितेश के सांसद चुने जाने के कारण ही इस सीट पर उपचुनाव हो रहा है।
बसपा ने राकेश पांडेय को उम्मीदवार बनाया था लेकिन उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से लड़ने में असमर्थता व्यक्त कर दी। तब बसपा ने विधानसभा में दल के नेता लालजी वर्मा की पुत्री छाया वर्मा को प्रत्याशी बनाया है। समीकरणों के मद्देनजर भाजपा का मुकाबला आसान नहीं दिखता। बावजूद इसके भाजपा से शेरबहादुर के पुत्र के प्रत्याशी होने के चलते उसकी जीत सपना पूरा हो सकता है।