लखनऊ। आईआईएम रोड से किसान पथ तक गोमती किनारे बन रहे लगभग 28 किमी के ग्रीन कॉरिडोर के लिए अभी 150 से अधिक पेड़ों की बलि लेना बाकी है। विकास के नाम पर बीते 10 दिन में 100 से ज्यादा पेड़ बलिदान हो चुके हैं। वन विभाग की ओर से 250 से अधिक पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई थी।
वन विभाग का कहना है कि सड़क चौड़ीकरण के लिए पेड़ों को काटने की अनुमति इस शर्त पर दी गई कि एक के बदले 10 पेड़ लगाए जाएंगे। इस पर स्थानीय नागरिकों ने सवाल उठाया है कि उनके घर, मोहल्ले, इलाके से उजाड़े गए वर्षों पुराने पेड़ों की भरपाई क्या कोई तत्काल कर पाएगा? उनके घर के पास की रौनक छीनकर कहीं और 10 पेड़ लगाने से उन्हें क्या हासिल होगा? दशकों पुराने हरे-भरे पेड़ों को उन्हीं के इलाके में कहीं और प्रत्यारोपण का प्रयास क्यों नहीं किया गया?
प्रत्यारोपण के जरिये कानपुर में बचाए गए पेड़
पेड़ों को बचाने के मामले में पड़ोसी जिला कानपुर बेहतरीन उदाहरण है। यहां मेट्रो निर्माण हो या सीएम ग्रिड योजना के कार्य। दोनों मामलों में आड़े आ रहे हरे पेड़ काटे नहीं गए, बल्कि तकनीक का इस्तेमाल कर मशीनों के जरिये कहीं और शिफ्ट किए गए। निर्माण एजेंसी यूरिडा ने नगर निगम से कहा था कि इस समस्या के निदान के लिए सड़क निर्माण की डिजाइन बदली जा सकती हो तो बदल दी जाए।
पेड़ बचाने के लिए पेश की नजीर
लालबाग स्थित स्मार्ट सिटी के दफ्तर ने पेड़ों को बचाने के लिए शानदार नजीर पेश की। चारदीवारी निर्माण के दौरान पेड़ों को बचाने के लिए दीवार में उनके फलने-फूलने के लिए पर्याप्त जगह छोड़ दी गई है। इसी तरह कैसरबाग की छतरमंजिल की चारदीवारी का डिजाइन ही बदल दिया गया। राजधानीवासियों के लिए विकास का यह मॉडल एक नजीर है।
हरियाली से गर्मी जनित मृत्यु दर पर लगती है लगाम
'द लैंसेट प्लैनेटरी हेल्थ' नाम के अंतरराष्ट्रीय जर्नल का अध्ययन है कि सड़कों पर पर्याप्त हरियाली होने से राहगीरों को लू नहीं लगती। गर्मी के कारण होने वाली मृत्यु दर में कमी आती है। हरियाली का वातावरण बेहतर स्वास्थ्य में बड़ी भूमिका निभाता है।
राजधानी में भी चिपको आंदोलन की जरूरत
बीरबल साहनी मार्ग पर काट दिए गए पेड़ों पर स्थानीय नागरिकों में रोष है। स्थानीय निवासी संजय मोहन का कहना है कि उनकी सारी कोशिशें नाकाम रहीं। आने वाली पीढ़ी के लिए इन पेड़ों का रहना जरूरी था। पेड़ों की रक्षा के लिए राजधानी में भी चिपको आंदोलन की जरूरत है। पेड़ों को बचाने के लिए उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल और चमोली में पेड़ों और जंगलों को कटने से बचाने के लिए सुंदरलाल बहुगुणा, गौरा देवी और सुदेशा देवी की अगुआई में 1973 में आंदोलन हुआ जो पूरी दुनिया में चर्चित हुआ। इस आंदोलन में लोग पेड़ों से चिपक कर गले लगाने लगे थे।
जहां सड़क का चौड़ीकरण करना था, वहां एलडीए और वन विभाग के अधिकारियों ने मिलकर सर्वे किया। ऐसा लेआउट तैयार किया, जिसमें पेड़ों को कम से कम नुकसान हो। पुराने और घने वृक्षों को बचाने का प्रयास किया गया। 28 किमी लंबाई वाली योजना में एक फीट तक की मोटाई के लगभग 250 पेड़ों को काटने की अनुमति दी गई।
सितांशु पांडेय, डीएफओ, लखनऊ