ओणम् केरल का राजकीय महोत्सव है, जो बड़े उत्साह से मनाया जाता है। एक लोकगाथा के अनुसार, इस दिन मिथकीय महाबली शासक राजा बलि अपनी प्रजा को सुख-चैन से जिंदगी बसर करता देखने के लिए एक दिन के लिए उस धरती पर अवतरित होते हैं, जहां से वामन अवतार ने छल से उन्हें पाताल भेज दिया था। फूलों की रंगोली, सर्पाकार विशाल नावों की दौड़ का आनंद लेने के बाद ‘साद्या’ छका जाता है।
‘साद्या’ केरल का महाभोज है, मलयालम के इस शब्द का अनुवाद ‘दावत’ भी कर सकते हैं। ‘साद्या’ का आयोजन शादी ब्याह के अलावा त्योहारों पर भी किया जाता है। इसमें 24 से 28 व्यंजन तक परोसे जाते हैं। जनश्रुति के अनुसार, पहले इनकी संख्या 64 तक होती थी। सारे व्यंजन शाकाहारी होते हैं और केले के पत्ते पर अपने सुनिश्चित स्थान पर ही परोसे जाते हैं। बाएं हाथ के ऊपर अचार रखा जाता है और नीचे की तरफ केला। ऊपर की तरफ पापड़, नमक, नींबू की फांक, चटनियां केले तथा कटहल और जिमीकंद के चिप्स आदि रहते हैं, ताकि रसेदार व्यंजनों की तरी में भीग न जाएं।
मुख्य आहार चावल ही होता है और अन्य सभी को कूटन संयुक्त नाम दिया जाता है। सांबर, रसम, कोझांबु के साथ ओलन, अवियल, थोरन, पुलिनकरी, एरिसारि, उपकरि अनिवार्यतः निर्धारित व्यंजन हैं। पारंपरिक विधान के अनुसार, ‘साद्या’ में उन्हीं सब्जियों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जो केरल में पैदा होती हैं और मौसम के अनुकूल खाई जाती हैं। आजकल कुछ लोग गाजर, फली आदि को शामिल करने लगे हैं यह कह कि अब इन्हें केरल में उगाया और खाया जाता है। हालांकि कुछ लोग पारंपरिक वर्जना को रूढ़ीवादी समझकर अपने ‘साद्या’ में मछली और मांस को जगह देने लगे हैं और फर्श पर पालथी मारकर इसका आनंद लेने की बजाय केले के पत्ते को मेज पर ही धर देते हैं। इस तरह नए बदलाव को अधिकांश मलयाली हिकारत की नजर से ही देखते हैं।
इतने सारे व्यंजनों को सूची में शामिल करने का एक कारण यह हो सकता है कि मेहमानों को कुछ तो पसंद जरूर आएगा। आयुर्वेद के जानकारों का मानना है कि इसका असली कारण उन सभी रसों को इस भोज में सम्मिलित करना है, जो हमें निरोग रखते हैं। कद्दू की खट्टी पुलिनकरी तथा अदरक की इंजिपुली इसी का उदाहरण हैं।
जिमीकंद, कद्दू, कच्चा केला जैसी आम सब्जियों की बहार ‘साद्या’ में देखने तथा चखने को मिलती है। पकाने के लिए नारियल के तेल का इस्तेमाल और कई तरीदार व्यंजनों में नारियल के दूध का इस्तेमाल होता है। कसा हुआ ताजा नारियल भी खुले हाथ से डाला जाता है। मसाले बहुत हल्के रहते हैं और इलायची, दालचीनी तथा लौंग और काली मिर्च ही भोजन को सुवासित बनाते हैं।
खाने के समापन के लिए जो मिष्ठान निर्धारित हैं उनमें तीन तरह की खीर यानी पायसम हैं, जिनमें चावल के आटे की कतलियों से बना प्रदमन् और दाल से बना परिप्पु पायसम मुख्य हैं। पके कटहल की पायसम भी लोकप्रिय है। मिठास के लिए चीनी की जगह गुड़ का प्रयोग किया जाता है। एक मजेदार परंपरा यह भी थी, जिसका निर्वाह आजकल कम होता है कि मेहमान अपने मेजबान से अचानक किसी भूले बिसरे ‘साद्या’ के अंग रहे व्यंजन की फरमाइश कर सकते थे। इसे ‘वल्ला ‘साद्या’’ कहते थे। मेजबान को इसके लिए तैयार रहना होता था। मुश्किल यह थी कि सारे व्यंजन खास रसोइयों द्वारा शुद्ध-पवित्र पद्धति से ही बनाए जाते हैं। अतः मेहमानों की तनुक मिजाजी का पूर्वानुमान लगाना सहज नहीं था।