मलेरिया, डेंगू व फाइलेरिया जैसी बीमारियां फैलाने वाले मच्छरों की प्रजातियों के बीच एक ऐसा मच्छर भी है जो इन बीमारियों की रोकथाम में कारगर हो सकता है। आमतौर पर जंगलों में ही पाए जाने वाले टेक्सोरिनकाइटिस नामक इस मच्छर की प्रजाति झांसी शहर में मलेरिया विभाग के कीट वैज्ञानिक ने ढूंढ निकाली है।
इस प्रजाति के मच्छरों का लार्वा डेंगू, मलेरिया व फाइलेरिया के मच्छरों के लार्वा को खा जाता है। आम बोली में हाथी मच्छर कही जाने वाली यह प्रजाति जंगलों की आबोहबा के बाहर जीवित नहीं रह पाती है।
विभाग ने इस लार्वा को विकसित करने व विशेष शोध के लिए मलेरिया मुख्यालय, लखनऊ एवं नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कम्यूनिकेबल डिसीज दिल्ली को भेजने का फैसला किया है।
दुर्लभ प्रजाति का है यह मच्छर
मंडलीय मलेरिया वेक्टर जनित रोग विभाग के कीट वैज्ञानिक डॉ. रविदास ने बताया कि विभाग के कीट संग्राहकों ने कुछ दिन पहले नगर के चंद्रशेखर मुहल्ले में स्थित इंदिरा पार्क में एक गड्ढे से कुछ लार्वा एकत्रित किए थे। सामान्य प्रक्रिया के तहत एडिज, क्यूलेक्स व एनाफिलीज लार्वा के साथ इन नए लार्वा को भी रखा गया। एक- दो दिनों के भीतर तीन नए लार्वा ने साथ रखे गए अन्य लार्वा को खा लिया।
इस नए लार्वा पर शोध करने के बाद पता चला कि यह अति दुर्लभ टेक्सोरिनकाइटिस प्रजाति का मच्छर है। यह मच्छर मनुष्य का खून चूसने के बजाए, फूल व पेड़ पौधों से रस लेकर जिंदा रहता है। इसी वजह से इसका जीवन चक्र जंगलों में सीमित रहता है। शहरी वातावरण इन्हें रास नहीं आता है।
डॉ. दास के मुताबिक एडिज, क्यूलेक्स व एनाफिलीज मच्छरों को अंडे देने के लिए मनुष्य के खून में मिलने वाले ग्लोबिन प्रोटीन की जरूरत होती है, जबकि टेक्सोरिनकाइटिस वयस्क मच्छर को कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता होती है। इस प्रजाति के मच्छर के लार्वा को प्रोटीन की जरूरत होती है। इस वजह से यह दूसरे मच्छरों के लार्वा को खा जाता है।
अपर निदेशक स्वास्थ्य डॉ. राजेंद्र सिंह परिहार ने बताया कि शहरी आबोहवा में पैदा हुए इन लार्वा को विकसित कर मच्छरों को समाप्त करने के एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसे विकसित करने एवं शोध कार्य के लिए मलेरिया मुख्यालय, लखनऊ एवं नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ कम्यूनिकेबल डिसीज, दिल्ली भेजा जा रहा है।
मच्छर का जीवन चक्र
- मच्छर जीवन चक्र 21 दिन का होता है।
- 24 घंटे में अंडा विकसित होकर लार्वा बनता है।
- 4 से 5 दिन बाद लार्वा प्यूपा में बदल जाता है।
- दो दिनों में प्यूपा वयस्क मच्छर बन जाता है।
- मच्छर की सामान्य उम्र 7 से 10 दिनों की होती है।
- एक बार मनुष्य को काटने के बाद मादा मच्छर 48 से 72 घंटे के अंदर अंडे देती है।
- 27 सेंटीग्रेड के तापमान पर वह एक जीवन चक्र में चार से छह बार अंडे देती है।
- एक बार में एनाफिलीज मच्छर 150, क्यूलेक्स 400 एवं एडीज 150 अंडे देती है।
- टेक्सोरिनकाइटिस मच्छर की सामान्य उम्र 30 दिन की होती है।
- अपने पूरे जीवन चक्र में मात्र यह 120 अंडे देती है।
- खतरनाक मच्छरों की तरह यह भी डोमेस्टिक कंटेनर ब्रीडर है।