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दो घंटे में बीमारी की पुष्टि करेगा यह ब्लड टेस्ट

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लंदन के किंग्स कॉलेज में शुरुआती अध्ययन इस ओर इशारा करते हैं कि एक सरल ब्लड टेस्ट या ख़ून की जांच से दो घंटे में सेप्सिस का पता चल सकता है।
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मौजूदा तरीकों से सेप्सिस की पुष्टि होने में दो दिन तक लग जाते हैं। इसकी वजह से जान बचाने के लिए ज़रूरी एंटीबायोटिक दवाईयों से इलाज शुरु करने में देर हो जाती है।

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शरीर के इम्मयून सिस्टम या प्रतिरक्षा तंत्र के संक्रमण के प्रति अनावश्यक प्रतिक्रिया से सेप्सिस होता है। इससे ब्रिटेन में हर साल 37,000 मौतें होती हैं।
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शोधकर्ताओं का कहना है कि अस्पताल में सेप्सिस या रक्त विषाक्तता की तेज़ी से जांच करने वाले परीक्षण से हज़ारों जाने बच सकती हैं।

महत्व
प्लोस वन नाम की पत्रिका में छपे अध्ययन में ख़ून के नमूनों में सेप्सिस का तेज़ी से पता करने के लिए शोधकर्ताओं ने एक बायोमार्कर की पहचान की है।

ये बायोमार्कर सेप्सिस से जुड़े न्यक्लियोटाइड्स का पता लगाता है।

लंदन के एक अस्पताल में एक छोटे शोध और स्वीडन में एक बड़े शोध में ये बात सामने आई है कि रक्त विषाक्तता का पता दो घंटे के अंदर ही चल सकता है। इस तरीके से सेप्सिस की पुष्टि के नतीजे 86 प्रतिशत तक सही पाए गए।

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता प्रोफ़ेसर ग्राहम लॉर्ड ने बीबीसी न्यूज़ को बताया, "अगर हमारे शुरुआती परीक्षणों के नतीजे जारी रहते हैं, तो इसका हज़ारों ज़िंदगियां बचाने और एंटीबायोटिक दवाइयों के अनावश्यक इस्तेमाल को घटाने में अहम असर पड़ेगा।"

प्रोफ़ेसर लॉर्ड ने आगे कहा, "अगर हम भविष्य में होने वाले परीक्षणों में जांच के इस तरीके के महत्व को साबित कर पाएं, तो हम इसे नेशनल हेल्थ सर्विस, एनएचएस, में जल्दी इस्तेमाल कर पाएंगे।"

प्रोफ़ेसर लॉर्ड ने ये भी कहा कि अभी और शोध की ज़रूरत है लेकिन अगर ये सफल होता है तो सेप्सिस की जांच का ये तरीका एनएचएस के पास अगले दो साल में आ जाएगा।

ब्रिटेन के सेप्सिस ट्रस्ट के चेयरमैन डॉक्टर रॉन डैनियल्स ने कहा है कि इस शोध से सेप्सिस की जल्दी पहचान का रास्ता तैयार हो गया है।

डॉक्टर डैनियल्स ने कहा, "अगर हमारे पास सेप्सिस की जांच का कोई सरल और भरोसेमंद तरीका होता तो इससे इलाज में बहुत मदद मिलती। लेकिन ये टेस्ट करने से पहले हमें मरीज़ में सेप्सिस होने का संदेह होना ज़रूरी है।
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इस साल सितंबर में देश की स्वास्थ्य सेवा ओम्बुड्ज़मन ने सेप्सिस के इलाज में बहुत कमियां बताई थीं और कहा था कि मरीज़ों की जान बचाने के लिए और ज़्यादा किए जाने की ज़रूरत है।
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