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थाइरॉइड से रिसती टूटे मन की कहानियां: हर एक बात उन्हें सीधी दिल में चुभती है, वे अकेले उदास कमरों में रोती हैं..!

सार

3 साल की रौनक के मुंह से यह बात सुनकर चाहे घर के बाकी सदस्य जी खोलकर हंसते हों, उसकी मम्मा रेणु को यह बात सीधी दिल मे चुभती है। वो या तो चिड़चिड़ा कर सबके बीच से उठकर चल देती है या फिर अकेले कमरे में रोती है। 

इस बीमारी ने जो शरीरिक समस्याएं रेणु को दी थीं, उसपर अब बहुत ज्यादा मानसिक अशांति और तनाव हावी हो चुका था।

रेणु को थाइरॉइड था, केवल शरीर को ही नहीं बल्कि मन और भावनाओं को भी ठेस पहुंचाने वाली बीमारी। स्वाति शर्मा बता रही हैं थाइरॉइड से ग्रसित रोगियों की अनकही व्यथा। 
 
 
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थाइरॉइड आपके शरीर में, गले के भीतर, पीछे की ओर स्थित तितली के आकार की एक ग्रन्थि या ग्लैंड है। इससे थाइरॉइड नामक हार्मोन स्रावित होता है। - फोटो : Amar ujala graphics
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विस्तार
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ये थकान, चिड़चिड़ाहट और तकलीफ, 

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नहीं है बहाना ये मानों,
जिस तकलीफ से गुज़र रही हूं, 
जरा उसको भी जानों
भीतर रिसते इस दर्द से भी ज्यादा टीसता है, 
अपनों का साथ न देना ज्यादा दुखता है।''


ढकने और धकाने की मानसिकता
पिछले तीन महीनों में 23 वर्षीय नेहा (नाम परिवर्तित) के मासिक चक्र का पूरा क्रम गड़बड़ा गया है। पहले कुछ महीनों तक उसने इसे 'धकाया' फिर जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई तो डॉक्टर के पास पहुंची। जांचों के बाद सामने आया कि उसके शरीर में थाइरॉइड का असंतुलन है। उसे लगातार रहने वाली थकान और मासिक चक्र के गड़बड़ाने की वजह यही थी। डॉक्टर ने दवाओं के साथ ही डाइट में चेंज और नियमित एक्सरसाइज़ के लिए कहा। कुछ समय तो दवाएं और डाइट जैसे तैसे नेहा ने मैनेज किया लेकिन 2-3 महीनों में ही गाड़ी फिर पहले से ढर्रे पर आ गई। 

मम्मा 'ततली'
3 साल की रौनक के मुंह से यह बात सुनकर चाहे घर के बाकी सदस्य जी खोलकर हंसते हों, उसकी मम्मा रेणु को यह बात सीधी दिल मे चुभती है। वो या तो चिड़चिड़ा कर सबके बीच से उठकर चल देती है या फिर अकेले कमरे में रोती है। 

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दरअसल, इस सो कॉल्ड मजाक की शुरुआत तब हुई थी जब थाइरॉइड की वजह से रेणु के बाल झड़ने लगे और जब तक इलाज शुरू हो पाता, उसके आधे से ज्यादा बाल झड़ चुके थे। इस बीमारी ने जो शरीरिक समस्याएं रेणु को दी थीं, उसपर अब बहुत ज्यादा मानसिक अशांति और तनाव हावी हो चुका था। दवाओं के साथ ही उसको काउंसिलिंग और परिवार के साथ की भी जरूरत थी।

मैनेजमेंट का झोल, मोटिवेशन की कमी
जीवन के 50 वसन्त पर चुकीं कुमुदनी अपनी एकमात्र बिटिया के ब्याह के बाद अचानक बढ़ते वजन, दिनभर रहने वाली सुस्ती और हाथ-पैरों के दर्द को उम्र का असर समझती रहीं। कुछ दिन दर्द निवारक लेकर निकाले, कुछ दिन गर्म पानी का सेक करके। आखिर एक दिन तकलीफ ज्यादा बढ़ी तो डॉक्टर ने टेस्ट करवाए और सामने आई समस्या थाइरॉइड की। थोड़ी देर के लिए घर में हो हल्ला मचा। आनन-फानन उनका रजिस्ट्रेशन एक जिम में करवा दिया गया। यह पूछे और जाने बिना कि वे जिम जाना मैनेज कैसे करेंगी। दवाइयों के साथ जिमिंग शुरू तो हुई, लेकिन ये उनके लिए और बड़ी मुश्किल बन गई। इस उम्र में थाइरॉइड का मुकाबला करने के लिए जिस मोटिवेशन और सहयोग की जरूरत कुमुद जी को थी, वह नदारद था। उनका सालों से सैट सामान्य रूटीन इस नई व्यवस्था से गड़बड़ा गया। ऊपर से अब बेटी भी नहीं थी जो काम में हाथ बंटाती। आखिर दो महीने की खींचतान के बाद जिम बन्द हो गया। 
 

तो आखिर है क्या थाइरॉइड?
थाइरॉइड आपके शरीर में, गले के भीतर, पीछे की ओर स्थित तितली के आकार की एक ग्रन्थि या ग्लैंड है। इससे थाइरॉइड नामक हार्मोन स्रावित होता है जो खून के बहाव के साथ पूरे शरीर में फैलता है। थाइरॉइड का मुख्य काम आपके शरीर मे मेटाबोलिज्म को नियंत्रित करना होता है। इस हार्मोन का असंतुलन ही कई प्रकार की दिक्कतें पैदा करता है। आंकड़े बताते हैं कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं थाइरॉइड सम्बन्धी समस्याओं की शिकार अधिक होती हैं। लगभग हर 8 में 1 महिला इस समस्या का शिकार होती हैं। 

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महिलाओं में हाइपरथायरायडिज्म के लक्षण - फोटो : Amar ujala graphics
समझिए थाइरॉइड क्यों बनता है ये चिंता कारण?
थाइरॉइड दो प्रकार से आपको प्रभावित कर सकता है। हायपरथाइरॉइडिज्म और हायपोथाइरॉइडिज्म। हायपरथाइरॉइडिज्म यानी जब थाइरॉइड ग्रंथि ज्यादा मात्रा में हार्मोन का रिसाव करने लगे। हायपोथाइरॉइडिज्म यानी जब ग्रन्थि कम मात्रा में हार्मोन बनाये। लक्षण भी इसी के अनुरूप सामने आते हैं। 

हायपरथाइरॉइडिज्म: 
हायपोथाइरॉइडिज्म:
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थाइरॉइड का असर महिलाओं के मासिक चक्र और प्रजनन पर पड़ता है। - फोटो : Amar ujala graphics
शरीर ही नहीं बल्कि सामाजिक जीवन पर भी प्रभाव 
अब जैसी कि भारतीय समाज की संरचना है, अधिकांश महिलाएं अब भी अपनी तकलीफ को छुपाने या टालने में विश्वास करती हैं। यहां तक कि इलाज के मामले में भी वे अपने लिए खर्च करने से पीछे हटती हैं। चाहे वह खर्च पैसे का हो, ऊर्जा का या फिर मेहनत का। घर में सबके लिए समय पर पसन्द का खाना तैयार करने के अलावा, सबकी हेल्दी डाइट और दवाओं का ध्यान रखने में ज्यादातर महिलाएं आगे रहती हैं लेकिन खुद की बारी आने पर वे पीछे हट जाती हैं। महिला सशक्तिकरण की तमाम चर्चाओं के बावजूद आज भी कुछ ही प्रतिशत महिलाएं ही सही समय पर डॉक्टर के पास पहुंच पाती हैं। महिलाओं के लिए यह भी एक लक्ज़री है। ऊपर से उनके आस पास उनकी तकलीफ को समझने वाले भी कम हैं। 
 
क्या कहते हैं डॉक्टर 
स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉ. नमिता शुक्ला, इंदौर, के अनुसार- थाइरॉइड का असर महिलाओं के मासिक चक्र और प्रजनन पर पड़ता है। ये दोनों ही स्थितियां महिलाओं के सामान्य स्वास्थ्य से जुड़ी हुई हैं। मुश्किल यह है कि किसी महिला को थाइरॉइड की समस्या है, यह पता लगाने में ही वह काफी समय जाया कर देती है।

डॉक्टर नमिता कहती हैं- प्रेग्नेंसी के दौरान तो हम रूटीन में थाइरॉइड का टेस्ट करवाते हैं और इससे समस्या के इलाज में आसानी हो जाती है लेकिन कई मामलों में महिलाएं समस्या का पता लगाने में ही देर करती हैं। ऐसे में इलाज में भी देर होती है और यह समस्या शारीरिक के साथ साथ मानसिक स्तर पर भी बहुत बढ़ जाती है। जरूरत इस बात को समझने की है कि कि थाइरॉइड के असंतुलन को ज्यादातर मामलों में सही समय पर, सही इलाज और सही रूटीन के साथ सन्तुलित किया जा सकता है। 


भोपाल की डॉ. अदिति सक्सेना (क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट) कहती हैं- थाइरॉइड जैसे कई मामलों में बाकी इलाज के अलावा काउंसिलिंग की जरूरत भी होती है। आपकी मेंटल हेल्थ और फिजिकल हेल्थ आपस मे जुड़ी हुई हैं। चूंकि थाइरॉइड के मामलों में शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं ऐसे में सबसे ज्यादा चोट महिलाओं के सेल्फ एस्टीम को पहुंचती हैं। ऊपर से उनके परिवार के लोग भी इस बात को हल्के में ले लेते हैं। यदि इंटेंशनली न भी हो तो भी सबके सामने उनके वजन, चेहरे पर आ रहे बदलाव, झड़ते बालों आदि को लेकर मजाक बनाया जाता है। यह महिलाओं के लिए दुगुना तकलीफदेह होता है। 

यहां परिवार और समाज की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। दवाई के साथ साथ मानसिक सम्बल और सहयोग परिवार प्रदान कर सकता है। महिलाएं खुद भी अपने लिए कुछ नियम बना सकती हैं। जैसे एक्सरसाइज के लिए जरूरी नहीं कि बहुत महंगा जिम या कोई क्लास अटैंड की जाए। सामान्य योग क्रियाएं और ब्रिस्क वॉक भी रूटीन में किया जा सकता है। जब आप परिवार के लिए हेल्दी बना सकती हैं तो उसमें कुछ हिस्सा अपने लिए भी निकाल सकती हैं। बच्चों को टिफिन देते समय उनके साथ साथ अपने लिए भी हेल्दी नाश्ता बना सकती हैं।


नोट: यह डॉ. अदिति सक्सेना (क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट) और स्त्री रोग विशेषज्ञ, डॉ. नमिता शुक्ला, इंदौर से एक बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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