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आपके बच्चे को हो सकता है 'ओपोजिशनल डिफिएंट डिसऑर्डर', जान लें लक्षण और बचाव

Thu, 15 Aug 2019 07:51 AM IST
पंखुड़ी सिंह लाइफस्टाइल डेस्क
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ओपोजिशनल डिफिएंट डिसऑर्डर (ओडीडी) एक मनोवैज्ञानिक विकार है। यह बच्चों में पाया जाता है। गुस्सैल और अड़ियल बर्ताव इस बीमारी का प्रमुख लक्षण है लेकिन उम्र के बढ़ने के साथ-साथ अन्य कई लक्षण भी नजर आने लगते हैं। मां-बाप की सतर्कता बच्चे को इस विकार से बचा सकती है। इसके लिए बच्चों को खास ख्याल रखना चाहिए।
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अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित मानसिक विकारों पर एक रिपोर्ट के अनुसार, गुस्सा और चिड़चिड़ा मूड मानसिक परेशानी का सबसे शुरुआती लक्षण है। लोगों से जल्दी चिढ़ जाना, जरा-सी बात पर गुस्सा हो जाना और अधिकतर नाराज रहना परेशानी के लक्षण हो सकते हैं। साथ ही यदि बच्चा बहुत ज्यादा बहस करता है। अकसर बड़ों की बात को अनसुना कर देता है। दूसरों को जानबूझकर परेशान करता है, या अपनी गलतियों का दोष दूसरों पर डाल देता है तो इसे सामान्य बात समझकर नजरअंदाज नहीं करें। 
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अगर 5-6 महीनों से बच्चे के व्यवहार में ऐसी चीजें लगातार दिख रही हों तो सतर्क रहने की आवश्यकता है। शुरुआती दौर में ओडीडी के लक्षण सिर्फ घर वालों या नजदीकी लोगों के साथ ही प्रकट हो सकते हैं। जैसे-जैसे परेशानी बढ़ती है, बच्चे के स्कूल और आस पड़ोस में व्यवहार भी बदल जाता है। जैसे-जैसे बच्चे की उम्र बढ़ती है, लक्षणों का असर बच्चे की अक्रामकता भी बढ़ा देती है। ओडीडी के कई कारण होते हैं। कभी-कभी यह आनुवांशिक होता है, वहीं कई बार मां-बाप की उपेक्षा भी कारण बनती है। यदि मां बच्चे को अधिक समय नहीं दे पा रही है। साथ ही उसे डांटती-मारती अधिक है तो ओडीडी की परेशानी बच्चे में उभर सकती है। ओडीडी का एक कारण आपकी पारिस्थितिकी भी हो सकती है।

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यदि आपके आसपास का वातावरण स्वच्छ नहीं है तो उसका असर भी बच्चे के मूड पर पड़ता है। यदि आपके बच्चे में ओडीडी के लक्षण हैं तो उत्तेजित न हों, उसे प्यार से समझाएं। उसकी परेशानियों को समझें। घर में एक सकारात्मक माहौल बनाएं। रोजमर्रा के जीवन में कुछ अच्छे नियम कायदे बनाएं और उनका प्यार से पालन कराएं। बच्चे की जीवनशैली को व्यवस्थित करें। बच्चे को ऐसी गतिविधियों से जोड़े जो उसे रचनात्मकता और मानसिक शांति की ओर ले जाएं। उसे दिमाग को शांत रखने में मदद मिल सके। 
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- फोटो : pixa
ओडीडी की समस्या दो तिहाई किशोरों में देखी जा सकती है। अगर समय से इसका सही इलाज नहीं हो और समस्या बढ़ती रहे तो यह गंभीर मानसिक रोगों का कारण बन सकती है। लड़कियों की अपेक्षा लड़कों में इसके लक्षण अधिक दिखते हैं। खासकर 6 से 8 साल की उम्र में इसका खतरा अधिक होता है। कभी-कभी वयस्कों में भी यह समस्या जन्म लेती है। यदि इसका समय से इलाज नहीं मिले तो यह डिप्रेशन, एंजाइटी, लैंग्वेज डिसऑर्डर , मूड डिसऑर्डर, लर्निग डिसऑर्डर जैसी समस्याओं को पैदा करता है।
-बच्चे को बहुत अधिक डांटे नहीं, प्यार से उसकी समस्याएं सुनें।
- बच्चे को जितना हो सके समय दें।
-बच्चे से बात करते वक्त धैर्य रखें, उसकी पूरी बात सुनें। ऐसा माहौल बनाएं कि बच्चा आपसे स्कूल, दोस्तों सबसे जुड़ी बातें शेयर कर सके।
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