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अमर उजाला फाउंडेशन की पहल: डॉक्टर ने बताया, कोरोना से ठीक के बाद कितना खतरनाक है फंगल इंफेक्शन?

Mon, 10 May 2021 09:22 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला
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पोस्ट कोविड खतरों को लेकर रहें सावधान - फोटो : iStock
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देश में कोरोना संक्रमण के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। हर रोज साढ़े तीन लाख से ज्यादा सामने आ रहे कोरोना रोगियों के चलते अब देश में कुल संक्रमितों की संख्या 2 करोड़ 26 लाख से ऊपर की हो गई है। हालांकि संक्रमण से ठीक होने वालों की संख्या में भी काफी इजाफा देखने को मिल रहा है, जोकि थोड़ी राहत भरी खबर है। इस बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि कोरोना से ठीक हो रहे लोगों में फंगल इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ रहा है, इस बारे में उन्हें विशेष सतर्कता बरतने की जरूरत है।
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अमर उजाला फाउंडेशन की पहल के माध्यम से कोरोना महामारी को लेकर सोमवार को हुई चर्चा में हमने विशेषज्ञों ने इसी विषय के बारे में जानने की कोशिश की। इस दौरान दिल्ली एम्स के डॉक्टर रंजन यादव ने सभी सवालों के जवाब दिए।

कोरोना के बाद क्यों बढ़ गया है फंगल संक्रमण का खतरा
इस सवाल के जवाब में डॉ रंजन यादव कहते हैं कि जो लोग इम्यूनो कंप्रोमाइज होते हैं उनमें इस तरह के संक्रमण का खतरा रहता है। कोरोना से ठीक हो रहे लोगों में  म्यूकॉरमाइकोसिस नामक संक्रमण का खतरा देखने को मिल रहा है, इसे काला फंगस के नाम से भी जानते हैं। यह फंगस प्राकृतिक रूप से हमारे वातावरण में मौजूद होता है। जब हमारा इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है ऐसी स्थिति में इसके संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। कोरोना के रोगियों को इलाज के समय में स्टेरॉयड दिया जाता है जिसके कारण ठीक होने के बाद लोगों में इस संक्रमण का खतरा हो सकता है।
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किन अंगों को प्रभावित कर सकता है यह संक्रमण
डॉ रंजन कहते हैं कि नाक के माध्यम से यह फंगस जब फेफड़े में पहुंच जाता है तो इसका असर वहां पर देखा जा सकता है। इसके अलावा यह साइनस और आंखों को भी प्रभावित कर सकता है। कुछ ऐसे मामले भी देखने को मिले हैं जिसमें म्यूकॉरमाइकोसिस का असर लोगों को मस्तिष्क पर भी देखा गया है। 
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म्यूकॉरमाइकोसिस संक्रमण के मामले सामने आए हैं - फोटो : Social media
कितना खतरनाक है म्यूकॉरमाइकोसिस का संक्रमण
इस सवाल के जवाब में डॉ रंजन कहते हैं कि यह फंगस हमारे वातावरण में मौजूद होता है लेकिन हमें तब तक नुकसान नहीं पहुंचाता है जब तक कि हमारी प्रतिरक्षा बहुत ही कमजोर न हो जाए। इसके संक्रमण के मामले बहुत ही कम देखने को मिलते हैं, हालांकि जिन लोगों को इसका संक्रमण हो जाए उन्हें खतरा भी बहुत अधिक होता है। इसके कारण होने वाली मृत्युदर 40 से 80 फीसदी तक की हो सकती है। 

कैसे करें पहचान?
डॉ रंजन कहते हैं कि जिन लोगों को इसका संक्रमण होता है उनकी नाक और आंख के पास लालिमा हो सकती है। कुछ लोगों को बुखार और उल्टी के साथ खून आने की भी दिक्कत होती है। यदि संक्रमण फेफड़ों में पहुंच जाए तो रोगी को सांस लेने की भी समस्या हो सकती है। 
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नोट: यह लेख दिल्ली एम्स के डॉक्टर रंजन यादव से बातचीत के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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