डॉ. एसपी जैसवार
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प्लेसेंटा प्रीविया : आम तौर पर प्लेसेंटा यानी गर्भनाल बच्चेदानी के ऊपर होती है। प्लेसेंटा प्रीविया की स्थिति में यह नीचे की तरफ होती है।
क्यों होता है : पहले प्रसव के दौरान दिक्कतें और सिजेरियन इसका मुख्य कारण है। सिजेरियन के कारण गर्भनाल बच्चेदानी के नीचे की तरफ हो जाती है। वहीं, 35 से ज्यादा की उम्र में प्रसव और गर्भाशय में रसौली (फाइब्रॉइड) निकलना जैसी दिक्कतें होती हैं।
आसान शब्दों में जानें क्या है समस्या
प्लेसेंटा एक्रीटा : गर्भनाल बच्चेदानी के आसपास या यूरिनरी ब्लैडर (पेशाब की थैली) में घुस जाती है।
बेहद खतरनाक : ऐसी स्थिति जानलेवा हो सकती है। इसमें गर्भनाल रहने पर अत्यधिक रक्तस्राव के साथ बच्चेदानी फट जाने की आशंका बढ़ जाती है।
वजह : डॉ. जैसवार बताती हैं कि सिजेरियन होना इसकी मुख्य वजह है। हमारे पास आने वाली मरीजों की केस स्टडी बताती है कि जिनमें पहला बच्चा सिजेरियन से हुआ, उनमें यह समस्या देखने को मिलती है। इसके पीछे प्रमुख वजह यही है कि स्पेशलिस्ट से सिजेरियन कराने के बजाय ऐसे चिकित्सक से सिजेरियन करा लेना, जिन्हें यह भी पता नहीं होता कि कितने टिश्यूज छोड़ने हैं, कितने नहीं। इसका नतीजा प्लेसेंटा एक्रीटा के रूप में सामने आता है।
सीएमएस डॉ. सुधा वर्मा के मुताबिक महीने में करीब 300 प्रसव होते हैं। इसमें 25 से 30 सिजेरियन केस होते हैं। ये कहीं न कहीं से रेफर्ड केस होते हैं, जो काफी हालत बिगड़ने के बाद हमारे पास आते हैं। इसके अलावा हमने साल में दो केस प्लेसेंटा एक्रीटा वाले किए। हालांकि उन्हें बाद में क्वीन मेरी भेजा था मॉनीटरिंग के लिए।
सीएमएस डॉ. नीरा जैन बताती हैं कि एक महीने में दो केस तो प्लेसेंटा एक्रीटा वाले आते ही हैं। ज्यादातर वजह पहला सिजेरियन ही होती है। एक महीने में 600 से 700 डिलीवरी होती है। इसमें से 200-250 सिजेरियन होते हैं। जबकि ऑन डिमांड वाले केस रोज एक-दो तो आते ही हैं, जिनकी हमें कभी डांट कर तो कभी प्यार से काउंसलिंग करनी होती है।
डॉ. सुजाता देव।
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क्वीन मेरी की गाइनेकोलॉजिस्ट डॉ. सुजाता देव बताती हैं कि कलर डॉप्लर से ही इसका पता चल पाता है। अगर समस्या है तो ऐसे अस्पताल में ही इलाज कराएं जहां ऑपरेशन के दौरान विशेषज्ञ डॉक्टर, यूरोलॉजिस्ट, जांच की सुविधाएं, ब्लड की तुरंत उपलब्धता हो। इसके अलावा नौ महीने तक विशेष देखभाल की जरूरत होती है।
ऐसे बच सकती हैं समस्या से
डॉ. सुजाता बताती हैं कि 12 से 24 घंटे का दर्द गर्भवती सहना नहीं चाहती हैं। मॉनीटरिंग कोई करना नहीं चाहता। थोड़ी सी जल्दबाजी भविष्य के लिए बड़ी मुसीबत बन जाती है। जब तक जरूरी न हो तब तक सिजेरियन कराने की सोचे भी नहीं।