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Coronavirus vaccine: कोरोना वैक्सीन कब तक आम लोगों को मिल पाएगी? जानें भारत समेत दुनियाभर के टीकों के ताजा अपडेट्स

Tue, 18 Aug 2020 09:49 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
कोरोना वायरस की चपेट में दुनिया को आए आठ महीने हो चुके हैं और इस बीमारी की चपेट में अब तक दो करोड़ 17 लाख लोग आ चुके हैं। सात लाख 75 हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। इन सबके बीच इस वायरस के खिलाफ सबसे बड़ी कामयाबी का एलान 11 अगस्त, 2020 को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने किया था। पुतिन ने दावा किया है कि उनके वैज्ञानिकों ने कोरोना वायरस की ऐसी वैक्सीन तैयार कर ली है जो कोरोना वायरस के खिलाफ कारगर है। पुतिन ने कहा कि इस टीके का इंसानों पर दो महीने तक परीक्षण किया गया और ये सभी सुरक्षा मानकों पर खरा उतरा है। इस वैक्सीन को रूस के स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी मंजूरी दे दी है। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
रूस का पहली वैक्सीन बनाने का दावा

गमलेया इंस्टीट्यूट में विकसित इस वैक्सीन के बारे में उन्होंने कहा कि उनकी बेटी को भी यह टीका लगा है। इस वैक्सीन को गमलेया इंस्टीट्यूट के साथ रूसी रक्षा मंत्रालय ने विकसित किया है। माना जा रहा है कि रूस में अब बड़े पैमाने पर लोगों को यह वैक्सीन देनी की शुरुआत होगी। रूसी मीडिया के मुताबिक, 2021 में जनवरी महीने से पहले दूसरे देशों के लिए ये उपलब्ध हो सकेगी। 

समाचार एजेंसी रायटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक रूस में सितंबर से इस वैक्सीन स्पुतनिक v का औद्यौगिक उत्पादन शुरू किया जाएगा। इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनियाभर के 20 देशों से इस वैक्सीन के एक अरब से ज्यादा डोज के लिए अनुरोध रूस को मिल चुका है। रूस हर साल 50 करोड़ डोज बनाने की तैयारियों में जुटा है। 

हालांकि रूस ने जिस तेजी से कोरोना वैक्सीन विकसित करने का दावा किया है, उसको देखते हुए वैज्ञानिक जगत में इसको लेकर चिंताएं भी जताई जा रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत दुनिया के कई देशों के वैज्ञानिक अब खुल कर इस बारे में कह रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि उसके पास अभी तक रूस के जरिए विकसित किए जा रहे कोरोना वैक्सीन के बारे में जानकारी नहीं है कि वो इसका मूल्यांकन करें। पिछले हफ्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन ने रूस से आग्रह किया था कि वो कोरोना के खिलाफ वैक्सीन बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन का पालन करे। 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
रूस के दावे पर शंका

विश्व स्वास्थ्य संगठन के तहत जिन छह वैक्सीन का तीसरे चरण का ट्रायल चल रहा है, उनमें रूस की वैक्सीन का जिक्र नहीं है। विश्व के दूसरे देश इसलिए भी रूस की वैक्सीन को लेकर थोड़े आशंकित हैं। दरअसल जिस कोरोना वैक्सीन को बना लेने का दावा रूस कर रहा है, उसके पहले फेज का ट्रायल इसी साल जून में शुरू हुआ था। रूस में विकसित इस वैक्सीन के ट्रायल के दौरान के सेफ्टी डेटा अभी तक जारी नहीं किए गए हैं। इस वजह से दूसरे देशों के वैज्ञानिक ये स्टडी नहीं कर पाए हैं कि रूस का दावा कितना सही है। 

रूस ने कोरोना के अपने टीके को लेकर उठी अंतरराष्ट्रीय चिंताओं को खारिज करते हुए इसे 'बिल्कुल बेबुनियाद' बताया है। जानकारों ने रूस के इतनी तेजी से टीका बना लेने के दावे पर संदेह जताया। जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और अमेरिका में वैज्ञानिकों ने इसे लेकर सतर्क रहने के लिए कहा। इसके बाद रूस के स्वास्थ्य मंत्री मिखाइल मुराश्को ने रूसी समाचार एजेंसी इंटरफैक्स से कहा, 'ऐसा लगता है जैसे हमारे विदेशी साथियों को रूसी दवा के प्रतियोगिता में आगे रहने के फायदे का अंदाजा हो गया है और वो ऐसी बातें कर रहे हैं जो कि बिल्कुल ही बेबुनियाद हैं।' 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
अमेरिका में देश के सबसे बड़े वायरस वैज्ञानिक डॉक्टर एंथनी फाउची ने भी रूसी दावे पर शक जताया है। डॉक्टर फाउची ने नेशनल जियोग्राफिक से कहा, 'मैं उम्मीद करता हूं कि रूसी लोगों ने निश्चित तौर पर परखा है कि ये टीका सुरक्षित और असरकारी है। मुझे पूरा संदेह है कि उन्होंने ये किया है।' 

रूस की इस वैक्सीन से इतर इस समय कोरोना महामारी के खिलाफ दुनियाभर में वैक्सीन विकसित की लगभग 23 परियोजनाओं पर काम चल रहा है, लेकिन इनमें से कुछ ही ट्रायल के तीसरे और अंतिम चरण में पहुंच पाई हैं और अभी तक किसी भी वैक्सीन के पूरी तरह से सफल होने का इंतजार ही किया जा रहा है। इनमें ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी, मॉडर्ना फार्मास्युटिकल्स, चीनी दवा कंपनी सिनोवैक बॉयोटेक के वैक्सीन डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स अहम हैं। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की वैक्सीन

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के वैक्सीन प्रोजेक्ट ChAdOx1 में स्वीडन की फार्मा कंपनी एस्ट्राजेनेका भी शामिल है। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की कोविड वैक्सीन के ट्रायल का काम दुनिया के अलग-अलग देशों में चल रहा है। मई के महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन की चीफ साइंटिस्ट सौम्या विश्वनाथन ने ऑक्सफोर्ड के प्रोजेक्ट को सबसे एडवांस कोविड वैक्सीन कहा था। इंग्लैंड में अप्रैल के दौरान इस वैक्सीन प्रोजेक्ट के पहले और दूसरे चरण के ट्रायल का काम एक साथ पूरा किया गया। 

18 से 55 साल के एक हजार से ज्यादा वॉलिंटियर्स पर किए गए ट्रायल में वैक्सीन की सुरक्षा और लोगों की प्रतिरोधक क्षमता का जायजा लिया गया था। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी का ये वैक्सीन प्रोजेक्ट अब ट्रायल और डेवलपमेंट के तीसरे और अंतिम चरण में है। ऑक्सफोर्ड कोविड वैक्सीन के ट्रायल के इस चरण में करीब 50 हजार वॉलिंटियर्स के शामिल होने की संभावना है। दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, ब्रिटेन और ब्राजील जैसे देश ट्रायल के अंतिम चरण में भाग ले रहे हैं। 

भारत की सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया भी ऑक्सफोर्ड कोविड वैक्सीन के भारत में इंसानों पर परीक्षण की तैयारी में है। अगर अंतिम चरण के नतीजे भी सकारात्मक रहे, तो ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम साल के आखिर तक ब्रिटेन की नियामक संस्था 'मेडिसिंस एंड हेल्थकेयर प्रोडक्ट्स रेगुलेटरी एजेंसी' (एमएचआरए) के पास रजिस्ट्रेशन के लिए साल के आखिर तक आवेदन करेगी।  
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Moderna Vaccine - फोटो : Instagram
अमेरिका की मॉडर्ना कोविड वैक्सीन

बीते 15 जुलाई को अमेरिका में टेस्ट की जा रही कोविड-19 वैक्सीन से लोगों के इम्युन को वैसा ही फायदा पहुंचा है जैसा कि वैज्ञानिकों को उम्मीद थी। हालांकि अभी इस वैक्सीन का अहम ट्रायल होना बाकी है। अमेरिका के शीर्ष विशेषज्ञ डॉ. एंथोनी फाउची ने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस से कहा, 'आप इसे कितना भी काट-छांट कर देखो तब भी ये एक अच्छी खबर है।' माना जा रहा है कि मॉडर्ना वैक्सीन प्रोजेक्ट अपने अंतिम चरण के शुरुआती हिस्से में है। मॉडर्ना ट्रायल के इस चरण में 30 हजार लोगों पर इस वैक्सीन का परीक्षण करेगी।  

विशेषज्ञों का कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर किसी नए प्रोडक्ट का परीक्षण तभी किया जाता है, जब वो नियामक एजेंसियों के पास मंजूरी के लिए दाखिल किए जाने के आखिरी दौर में हो। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कोरोना वायरस के लिए इसे अब तक की सबसे तेज वैक्सीन प्रोजेक्ट करार दिया है। मॉडर्ना के क्लीनिकल ट्रायल में अमेरिका का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (एनआईएच) भी शामिल है। एनआईएच के निदेशक फ्रांसिस कोलिंस का कहना है कि साल 2020 के आखिर तक कोरोना की वैक्सीन बना लेने का लक्ष्य रखा गया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
मॉडर्ना के मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टीफन बांसेल ने बताया, 'मुझे उम्मीद है कि मॉडर्ना की वैक्सीन अमेरिकी एजेंसी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के मापदंडों पर 75 फीसदी तक खरी उतरेगी। हमें उम्मीद है कि ट्रायल में हमारी वैक्सीन कोरोना को रोकने में कामयाब होगी और हम इससे महामारी को खत्म कर पाएंगे।' 

नेशनल इंस्टिट्यूट्स ऑफ हेल्थ और मॉडर्ना इंक में डॉ. फाउची के सहकर्मियों ने इस वैक्सीन को विकसित किया है। 27 जुलाई से इस वैक्सीन का सबसे अहम पड़ाव शुरू हो चुका है। तीस हजार लोगों पर इसका परीक्षण किया जा रहा है और पता किया जाएगा कि क्या ये वैक्सीन वाकई कोविड-19 से मानव शरीर को बचा सकती है। 

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI
चीन भी है वैक्सीन के होड़ में

चीन की प्राइवेट फार्मा कंपनी सिनोवैक बॉयोटेक जिस कोविड वैक्सीन प्रोजेक्ट पर काम कर रही है, वो ट्रायल के तीसरे और आखिरी चरण में पहुंच चुकी है। सरकारी मंजूरी से पहले किसी वैक्सीन को इंसानों पर परीक्षण में खरा उतरना होता है। मॉडर्ना और ऑक्सफोर्ड के बाद ट्रायल के अंतिम चरण में पहुंचने वाला ये दुनिया का तीसरा वैक्सीन डेवलपमेंट प्रोजेक्ट है। CoronaVac नाम की इस वैक्सीन का फिलहाल ब्राजील में नौ हजार वॉलिंटियर्स पर ट्रायल चल रहा है। 

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Coronavirus Vaccine - फोटो : Amar Ujala
भारत की दावेदारी- 'Covaxin'

15 अगस्त को लाल किले से अपने संबोधन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में तीन कोरोना वैक्सीन के ट्रायल की बात कही है। इनमें से भारत में दो वैक्सीन पर काम चल रहा है जबकि तीसरा वैक्सीन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में विकसित हुआ वैक्सीन है, जिसे भारत में सीरम इंस्टीट्यूट मुहैया करा रहा है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस वैक्सीन के ट्रायल कहां कहां शुरू हुए हैं। 

भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड की वैक्सीन का नाम कोवैक्सीन है। दूसरा वैक्सीन प्रोजेक्ट जाइडस कैडिला हेल्थकेयर लिमिटेड का है। कोवैक्सीन के डेवलपमेंट प्रोजेक्ट में सरकारी एजेंसी इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी शामिल हैं। इसके ह्यूमन ट्रायल के लिए देशभर में 12 संस्थाओं को चुना गया है, जिनमें रोहतक की पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, हैदराबाद की निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज शामिल हैं। 

आईसीएमआर के महानिदेशक डॉक्टर बलराम भार्गव ने पिछले दिनों इन 12 संस्थाओं के प्रिंसिपल इन्वेस्टीगेटर्स से कोवैक्सीन ह्यूमन क्लीनिकल ट्रायल की रफ्तार में तेजी लाने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि ये शीर्ष प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में से एक है, जिस पर सरकार के शीर्ष स्तर से निगरानी रखी जा रही है। लेकिन हेल्थ एक्सपर्ट्स इस पर सवाल उठा रहे हैं कि वैक्सीन तैयार करने के लिए जितने समय की जरूरत होती है और जिन प्रक्रियाओं से गुजरना होता है, क्या उनका पालन किया गया है। वैसे मोटे तौर पर अनुमान लगाया जा रहा है कि अगर जल्दी से वैक्सीन मिली भी तो भी इस साल के अंत तक ही मिल पाएगी। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख कई बार वैक्सीन बनाए जाने को लेकर नाउम्मीदी भी जाहिर कर चुके हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Amar Ujala
कोरोना वायरस की वैक्सीन इतनी अहम क्यों है?

आशंका यह है कि दुनिया की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कोरोना वायरस की चपेट में आ सकता है। ऐसे में वैक्सीन इन लोगों को कोरोना वायरस की चपेट में आने से बचा सकता है। कोरोना वायरस की वैक्सीन बन जाने से महामारी एक झटके में खत्म तो नहीं होगी, लेकिन तब लॉकडाउन का हटाया जाना खतरनाक नहीं होगा और सोशल डिस्टेंसिंग के प्रावधानों में ढिलाई मिलेगी। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वैक्सीन बनाने को लेकर अब तक कितनी प्रगति हुई है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कोरोना वायरस के पहले मामले की पुष्टि 31 दिसंबर 2019 को हुई थी। जिस तेजी से वायरस फैला उसे देखते हुए 30 जनवरी 2020 को इसे पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर दिया गया। लेकिन शुरुआती वक्त में इस वायरस के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी और इस कारण इसका इलाज भी जल्द नहीं मिल पाया। विश्व स्वास्थ्य संगठन समेत कई देशों में डॉक्टर इससे निपटने के लिए वैक्सीन बनाने में जुटे हैं, लेकिन सवाल यही है कि आखिर इसके तैयार होने में कितना वक्त लगेगा? 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
अमेरिकी फार्मा कंपनी 'फाइजर' और जर्मन कंपनी 'बॉयोएनटेक' मिलकर एक कोविड वैक्सीन प्रोजेक्ट BNT162b2 पर काम कर रही हैं। दोनों कंपनियों ने एक साझा बयान जारी कर बताया है कि वैक्सीन प्रोजेक्ट इंसानों पर परीक्षण के आखिरी चरण में पहुंच गई है। अगर ये परीक्षण सफल रहे, तो अक्तूबर के आखिर तक वे सरकारी मंजूरी के लिए आवेदन दे सकेंगे। कंपनी की योजना साल 2020 के आखिर तक वैक्सीन की 10 करोड़ और साल 2021 के आखिर तक 1.3 अरब खुराक की आपूर्ति सुनिश्चित करने की है। 

इसका अलावा शीर्ष दवा कंपनियां सनफई और जीएसके ने भी वैक्सीन विकसित करने के लिए आपस में तालमेल किया है। ऑस्ट्रेलिया में भी दो संभावित वैक्सीन का नेवलों पर प्रयोग शुरू हुआ है। माना जा रहा है कि इसका इंसानों पर ट्रायल अगले साल तक शुरू हो पाएगा। जापान की मेडिकल स्टार्टअप एंजेस ने कहा है कि उसने कोरोना वायरस की संभावित वैक्सीन का इंसानों पर परीक्षण शुरू कर दिया है। जापान में इस तरह का यह पहला परीक्षण है। कंपनी ने कहा है कि ओसाका सिटी यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में अगले साल 31 जुलाई तक ट्रायल जारी रहेंगे। लेकिन कोई यह नहीं जानता है कि इनमें से कोई सी कोशिश कारगर होगी। 

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coronavirus vaccine China - फोटो : Social Media
कब तक बन पाएगी कोरोना की वैक्सीन? 

किसी भी बीमारी की वैक्सीन विकसित होने में सालों का वक्त लगता है। कई बार दशकों का समय लगता है, लेकिन दुनियाभर के रिसर्चरों को उम्मीद है कि वे कुछ ही महीनों में उतना काम कर लेंगे जिससे कोविड-19 की वैक्सीन विकसित हो जाएगी। कोरोना वायरस कोविड 19 को लेकर बेहद तेज गति से काम चल रहा है और टीका बनाने के लिए भी अलग-अलग रास्ते अपनाए जा रहे हैं। 

ज्यादातर एक्सपर्ट की राय में 2021 के मध्य तक कोविड-19 की वैक्सीन बन जाएगी यानी कोविड-19 वायरस का पता चलने के बाद वैक्सीन विकसित होने में लगने वाला समय 18 महीने माना जा रहा है। अगर ऐसा हुआ तो यह एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि होगी, लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वैक्सीन पूरी तरह कामयाब ही होगी। अब तक चार तरह के कोरोना वायरस पाए गए हैं जो इंसानों में संक्रमण कर सकते हैं। इन वायरस के कारण सर्दी-खांसी जैसे लक्षण दिखते हैं और इनके लिए अब तक कोई वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अभी कितना कुछ करना बाकी है?

कोविड-19 की वैक्सीन को तैयार करने की तमाम कोशिशें चल रही हैं, लेकिन अभी भी इस दिशा में काफी कुछ किए जाने की जरूरत है। वैक्सीन तैयार होने के बाद पहला काम इसका पता लगाना होगा कि यह कितनी सुरक्षित है। अगर यह बीमारी से कहीं ज्यादा मुश्किलें पैदा करने वाली हुईं तो वैक्सीन का कोई फायदा नहीं होगा। रूस की वैक्सीन को इसी पहलू के चलते शंका के साथ देखा जा रहा है। 

क्लीनिकल ट्रायल में यह देखा जाना होता है कि वैक्सीन कोविड-19 को लेकर प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर पा रही है ताकि वैक्सीन लेने के बाद लोग इसकी चपेट में न आएं। वैक्सीन तैयार होने के बाद भी इसके अरबों डोज तैयार करने की जरूरत होगी। वैक्सीन को दवा नियामक एजेंसियों से भी मंजूरी लेनी होगी। 

ये सब हो जाए तो भी बड़ी चुनौती बची रहेगी। दुनियाभर के अरबों लोगों तक इसकी खुराक पुहंचाने के लिए लॉजिस्टिक व्यवस्थाएं करने का इंतजाम भी करना होगा। जाहिर है इन सब प्रक्रियाओं को लॉकडाउन थोड़ा धीमा करेगा। एक दूसरी मुश्किल भी है अगर कोरोना से कम लोग संक्रमित होंगे तो भी इसका पता लगाना मुश्किल होगा कि कौन सी वैक्सीन कारगर है। वैक्सीन की जांच में तेजी लाने का एक रास्ता है कि पहले लोगों को वैक्सीन दिया जाए और उसके बाद इंजेक्शन के जरिए कोविड-19 उनके शरीर में पहुंचाया जाए। लेकिन यह तरीका मौजूदा समय में बेहद खतरनाक है क्योंकि कोविड-19 का कोई इलाज मौजूद नहीं है। 

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कितने लोगों को वैक्सीन देने की जरूरत होगी?

वैक्सीन कितना कारगर है, यह जाने बिना इसका पता नहीं चल पाएगा। हालांकि कोविड-19 संक्रमण को रोकने के लिए यह माना जा रहा है कि 60 से 70 प्रतिशत लोगों को वैक्सीन देने की जरूरत होगी। हालांकि अगर वैक्सीन कारगर हुआ तो इसे दुनियाभर की आबादी को देने की जरूरत होगी। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
कैसे बनती है वैक्सीन?

इंसानी शरीर में खून में व्हाइट ब्लड सेल होते हैं जो उसके रोग प्रतिरोधक तंत्र का हिस्सा होते हैं। बिना शरीर को नुकसान पहुंचाए वैक्सीन के जरिए शरीर में बेहद कम मात्रा में वायरस या बैक्टीरिया डाल दिए जाते हैं। जब शरीर का रक्षा तंत्र इस वायरस या बैक्टीरिया को पहचान लेता है तो शरीर इससे लड़ना सीख जाता है। इसके बाद अगर इंसान असल में उस वायरस या बैक्टीरिया का सामना करता है तो उसे जानकारी होती है कि वो संक्रमण से कैसे निपटे। 

दशकों से वायरस से निपटने के लिए जो टीके बने, उनमें असली वायरस का ही इस्तेमाल होता आया है। मीजल्स, मम्प्स और रूबेला (एमएमआर यानी खसरा, कण्ठमाला और रुबेला) टीका बनाने के लिए ऐसे कमजोर वायरस का इस्तेमाल होता है जो संक्रमण नहीं कर सकते। साथ ही फ्लू की वैक्सीन में भी इसके वायरस का ही इस्तेमाल होता है। लेकिन कोरोना वायरस के मामले में फिलहाल जो नया वैक्सीन बनाया जा रहा है उसके लिए नए तरीकों का इस्तेमाल हो रहा है और जिनका अभी कम ही परीक्षण हो सका है। नए कोरोना वायरस Sars-CoV-2 का जेनेटिक कोड अब वैज्ञानिकों को पता है और अब हमारे पास वैक्सीन बनाने के लिए एक पूरा ब्लूप्रिंट तैयार है।

वैक्सीन बनाने वाले कुछ डॉक्टर कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड के कुछ हिस्से लेकर उससे नया वैक्सीन तैयार करने की कोशिश में हैं। कई डॉक्टर इस वायरस के मूल जेनेटिक कोड का इस्तेमाल कर रहे हैं जो एक बार शरीर में जाने के बाद वायरल प्रोटीन बनाते हैं ताकि शरीर इस वायरस से लड़ना सीख सके। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
क्या सभी उम्र के लोग बच पाएंगे?

माना जा रहा है कि वैक्सीन का ज्यादा उम्र के लोगों पर कम असर होगा, लेकिन इसका कारण वैक्सीन नहीं बल्कि लोगों की रोग प्रतरोधक क्षमता से है, क्योंकि उम्र अधिक होने के साथ-साथ व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी कम होती जाती है। हर साल फ्लू के संक्रमण के साथ ये देखने को मिलता है। सभी दवाओं के दुष्प्रभाव भी होते हैं। बुखार के लिए आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली पैरासेटामॉल जैसी दवा के भी दुष्प्रभाव होते हैं, लेकिन जब तक किसी वैक्सीन का क्लिनिकल परीक्षण नहीं होता, ये जानना मुश्किल है कि उसका किस तरह से असर पड़ सकता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
किनको मिलेगी सबसे पहले वैक्सीन?

अगर वैक्सीन विकसित हो जाए तो भी सबसे बड़ा सवाल यही है कि सबसे पहले वैक्सीन किनको मिलेगी, क्योंकि शुरुआती तौर पर वैक्सीन की लिमिटेड सप्लाई ही होगी। ऐसे में वैक्सीन किसको पहले मिलेगी, इसको भी प्रायरटाइज किया जा रहा है। कोविड-19 मरीजों का इलाज करने वाले स्वास्थ्यकर्मी इस सूची में टॉप पर हैं। कोविड-19 से सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों को होता है, ऐसे में अगर यह बुजुर्गों के लिए कारगर होता है तो उन्हें मिलना चाहिए। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pexels.com
जब तक वैक्सीन नहीं बनती तब तक...

ये बात सच है कि टीका व्यक्ति को बीमारी से बचाता है, लेकिन कोरोना वायरस से बचने का सबसे असरदार उपाय है अच्छी तरह साफ-सफाई रखना। सोशल डिस्टेंसिग के प्रावधानों को पालना करना। आपको यह भी ध्यान रखना है कि अगर आपको कोरोना वायरस संक्रमण हो भी जाता है तो 75 से 80 प्रतिशत मामलों में यह मामूली संक्रमण की तरह ही होता है। 
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