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जूलियस फ्यूचिक की कहानी 'सहायता'

Wed, 02 Mar 2022 10:14 PM IST
काव्य डेस्क अमर उजाला काव्य डेस्क - नयी दिल्ली

सार

ऊपर से देखने पर वह छोटा-सा दायरा लगता था। वहाँ बच्चे रंग-बिरंगे बंटों के साथ खेल रहे थे। जंग कविता का मुँह तो बन्द कर सकती नहीं है, बच्चों के खेलों को नहीं। एक हवाई जहाज ने निशाना बाँधा। बम बच्चों के ऐन बीच में आकर गिरा।
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विस्तार
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आज रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध ने तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। युद्ध हमेशा से विध्वंशक रहा है और सबसे ज्यादा प्रभावित आम जनता ही होती रही  है। चेक कथाकार-नाटककार जूलियस फ्यूचिक की कहानी 'सहायता' ऐसी ही कहानी है जो युद्ध के साये में लिखी गई है।  
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ऊपर से देखने पर वह छोटा-सा दायरा लगता था। वहाँ बच्चे रंग-बिरंगे बंटों के साथ खेल रहे थे। जंग कविता का मुँह तो बन्द कर सकती नहीं है, बच्चों के खेलों को नहीं। एक हवाई जहाज ने निशाना बाँधा। बम बच्चों के ऐन बीच में आकर गिरा।
लोग अपने घरों से भागे हुए आये और बच्चों की चीथड़े बनी लाशों के गिर्द जमा हो गये। आखिर उन्होंने लाशों को उठाया और स्कूल की इमारत में ले जाकर रखा, जहाँ से कुछ देर पहले वे हँसते-कूदते हुए आये थे।
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सरकारी फोटोग्राफर आया और उसने बड़े बेढंगे तरीके से उस हौलनाक दस्तावेजों को अपने कैमरे में बन्द कर लिया। दहशत के कारण उसका  गायब हो चुका था।
तीन दिन के अन्दर यह दस्तावेज पेरिस, लन्दन और प्राग पहुँच गया। समाचार-पत्रों ने उसे अपने पहले पृष्ठों पर छापा।
बहार की ऋतु थी वह। कोयले के डिपो के पीछे एक अकेला खड़ा पेड़ फूलों से भरा हुआ था, जो उस इलाके के धुएँ के समुद्र में प्रकाश स्तम्भ-सा प्रतीत होता था। और सामने एक स्थान की ओर मानो संकेत करता हुआ बच्चों को खेलने की दावत दे रहा था।
जिस दिन की बात मैं कर रहा हूँ, उस दिन छह लड़के वहाँ खेलने के लिए आये थे। वे बैठ गये और उन्होंने एक-दूसरे के साथ सिर जोड़ लिये।
फ्रान्ता ने अपनी स्कूल की कापी खोली और उसमें से समाचार-पत्र का एक पृष्ठ निकाला, उस पृष्ठ पर एक बच्चे का चेहरा उनकी ओर झाँक रहा था जिसका सिर बम से नष्ट हो चुका था।
एल मुइत का लड़का फ्रान्ता दृढ़ता भरे लहजे में पढ़ने लगा। तब उसकी आवाज बच्चों जैसी नहीं थी।
उसने वह समाचार पड़ा, जिसमें एल मुइत पर हुई बमबारी का वर्णन था, फासिस्टों की बर्बरता का वर्णन था, और उस वर्बरता के विरुद्ध जनता के रोष का वर्णन था।
उन लड़कों को लगा कि एल मुइत के वे बच्चे वे स्वयं थे, उन्हीं की तरह वे स्कूल से निकलकर बंटों से खेलने गये थे और मौत अचानक उन पर झपट पड़ी थी।
उन्होंने फटी हुई आँखों से ऊपर देखा। आकाश में बादल दौड़े जा रहे थे। वहाँ कोई दुश्मन नहीं था। लेकिन जब उन्होंने ध्यान से देखा तो अचानक दुश्मन के कई भयानक चेहरे दिखाई दिए। और फिर, उन्हें लगा, जैसे एल मुइत के वे बच्चे उस दुश्मन के खिलाफ उनसे सहायता माँग रहे थे।

क्या वे सहायता करेंगे?
बेशक!
लेकिन कैसे सहायता करेंगे?
उन्होंने समाचार-पत्र में देखा
स्पेनी लोगों की सहायता के लिए उगाही
पाँच, दस, पचास, सौ क्राउन...एक कॉलम में सहायतार्थ मिलनेवाली रकमों की लम्बी सूची थी।
तभी उन छह लड़कों की बारह जेबों में पड़ी दौलत निकाली गयी। कुल मिलाकर आधा क्राउन भी न बना।
''कल मैं और लाऊँगा।'' एक लड़के ने कहा।
''लेकिन कल तक...''
''कौन जाने कल तक क्या हो जाये!''
''आज ही... ''
निराशा भरी आँखें दूर तक देखती रहीं। कितना अच्छा हो, अगर कहीं पास ही कोई नोट पड़ा मिल जाये। या किसी की जेब से गिरा हुआ बटुआ मिल जाये...!
लेकिन कोई नोट या बटुआ नहीं मिला।
छह लड़कों के दिमा$गों ने बहुत सोचा।
अचानक एन्तोनीन ने कहा, ''मेरे पास चाकूवाला पेन है।''
''चाकूवाले पेन से क्या होगा?''
''अगर मैं इसे बेच दूँ?''
दस आँखें एन्तोनीन पर जम गयीं। क्या वह अपनी एकमात्र जायदाद बेच देगा?
तभी फ्रान्ता बड़े जोश में खड़ा हो गया। बाकी पाँचों लड़के भी खड़े हो गये। फ्रान्ता ने एन्तोनीन का हाथ पकड़कर दबाया।
फिर बिना कुछ बोले एन्तोनीन ने चाकूवाले पेन के पास अपनी पॉलिश वाली डिबिया रख दी, जो जीव-जन्तुओं का रैन-बसेरा थी। यद्यपि वह एन्तोनीन के चाकूवाले पेन जितनी कीमती नहीं थी। लेकिन उसमें एन्तोनीन के जीवन का इतिहास था।
रूदा ने अपने हाथों में आखिरी बार रंग-बिरंगे तेरह बंटों को मला, और जब जोसेफ ने अपनी सीटी सबके सामने रख दी तो रूदा को बड़ी शर्म आयी और उसने अपना चौदहवाँ बंटा भी तेरह बंटों में शामिल कर दिया। यह वह बंटा था, जिससे वह हमेशा जीता करता था।

 
 

आइसैक नाम का वह बूढ़ा यहूदी अपनी दूकान में काउंटर के पीछे खड़ा था। लड़कों ने यहाँ अपनी जेबों में से चीजें निकालकर उसके सामने रखीं और फिर उसके चेहरे पर नजरें गाड़ दीं।
आइसैक ने उन चीजों को एक नजर देखा और जैसे मुँह में बड़बड़ाया, ''मैं इनका क्या करूँगा?'' फिर, उसने ऊँची आवाज में कहा, ''मैं इनका क्या करूँगा?''
फ्रान्ता ने कहा, ''यह सब कुछ बिक्री के लिए है।''
आइसैक वहाँ आनेवाले लोगों को अच्छी तरह पहचानता था। वह उनकी आवाज सुनकर ही उनके दिल की बात जान जाता था। लेकिन फ्रान्ता की आवाज बिलकुल अलग किस्म की लग रही थी।
तभी फ्रान्ता ने कहा, ''यह चीजें सिगरेटों के लिए नहीं है।''
''हूँ...तो सिनेमा देखने के लिए होंगी?'' आइसैक ने कहा।
''नहीं।'' फ्रान्ता ने तल्ख होकर कहा, ''ये स्पेन की जंग के लिए है।'' यह कहना था कि फ्रान्ता के मन में डर पैदा हुआ कि वह यहूदी कहीं पुलिस को न खबर कर दे। पुलिस आकर उनका खजाना छीन लेगी और तब एल मुइत के बच्चों के लिए सहायता नहीं भेजी जा सकेगी। उसी समय उसने काउंटर पर पड़ी अपनी चीजों को समेटना चाहा।
''जरा देखने दो।'' आइसैक ने कहा।
उसने डिबिया उठाकर उसे ध्यान से देखता है। ''हूँ, इतनी बुरी नहीं पर मैं इसके दो क्राउन से ज्यादा नहीं दे सकता। और यह चाकू...बढ़िया कारीगरी का नमूना है...अच्छा, तो स्पेन की जंग के लिए?...बहुत बढ़िया कारीगरी का नमूना है...पाँच क्राउन...मेरे ख्याल में... ''
लड़कों के साँस रुके हुए थे।
आइसैक एक-एक चीज को उठाकर उसे ध्यान से देखता हुआ उसके कीमत का अन्दाजा लगाता रहा। आखिर उसने दराज में से बीस क्राउन निकाले और एक-एक करके गिनते हुए काउंटर पर रखे। 
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सभी जेबें खली हो गयीं, उनमें से जो चीजें निकलीं, वे थीं। चाकूवाला पेन, डिबिया, सीटी, बंटे, रस्सी, कागज का बना बटुआ, गुलेल, प्लाचीनका (प्लाचीनका उस समय का प्रसिद्ध फुटबाल खिलाड़ी था।) का फोटो और इसी प्रकार की कुछ और चीजें। सभी लड़कों ने अपने उस खजाने को गहरी नजर से देखा। फिर, उन्होंने उनकी बिक्री के लिए फ्रान्ता और एन्तोनीन को चुना।
वल्तावा नदी के दायें किनारे पर एक पुराना कस्बा बसा हुआ है। वहाँ की बाँकी, टेढ़ी, तंग गलियों में एक 'यहूदी’ की दूकान पर गरीब लोग अपनी दु:ख-तकलीफें लेकर आया करते हैं। फ्रान्ता और एन्तोनीन अपनी जेबों में भरे हुए खजाने को मजबूती से पकड़े लोगों भीड़ में चलते हुए उस यहूदी की दूकान की ओर जा रहे थे। उनके पीछे कुछ कदमों की दूरी पर उनके चारों साथी चल रहे थे।
आइसैक नाम का वह बूढ़ा यहूदी अपनी दूकान में काउंटर के पीछे खड़ा था। लड़कों ने यहाँ अपनी जेबों में से चीजें निकालकर उसके सामने रखीं और फिर उसके चेहरे पर नजरें गाड़ दीं।
आइसैक ने उन चीजों को एक नजर देखा और जैसे मुँह में बड़बड़ाया, ''मैं इनका क्या करूँगा?'' फिर, उसने ऊँची आवाज में कहा, ''मैं इनका क्या करूँगा?''
फ्रान्ता ने कहा, ''यह सब कुछ बिक्री के लिए है।''
आइसैक वहाँ आनेवाले लोगों को अच्छी तरह पहचानता था। वह उनकी आवाज सुनकर ही उनके दिल की बात जान जाता था। लेकिन फ्रान्ता की आवाज बिलकुल अलग किस्म की लग रही थी।
तभी फ्रान्ता ने कहा, ''यह चीजें सिगरेटों के लिए नहीं है।''
''हूँ...तो सिनेमा देखने के लिए होंगी?'' आइसैक ने कहा।
''नहीं।'' फ्रान्ता ने तल्ख होकर कहा, ''ये स्पेन की जंग के लिए है।'' यह कहना था कि फ्रान्ता के मन में डर पैदा हुआ कि वह यहूदी कहीं पुलिस को न खबर कर दे। पुलिस आकर उनका खजाना छीन लेगी और तब एल मुइत के बच्चों के लिए सहायता नहीं भेजी जा सकेगी। उसी समय उसने काउंटर पर पड़ी अपनी चीजों को समेटना चाहा।
''जरा देखने दो।'' आइसैक ने कहा।
उसने डिबिया उठाकर उसे ध्यान से देखता है। ''हूँ, इतनी बुरी नहीं पर मैं इसके दो क्राउन से ज्यादा नहीं दे सकता। और यह चाकू...बढ़िया कारीगरी का नमूना है...अच्छा, तो स्पेन की जंग के लिए?...बहुत बढ़िया कारीगरी का नमूना है...पाँच क्राउन...मेरे ख्याल में... ''
लड़कों के साँस रुके हुए थे।
आइसैक एक-एक चीज को उठाकर उसे ध्यान से देखता हुआ उसके कीमत का अन्दाजा लगाता रहा। आखिर उसने दराज में से बीस क्राउन निकाले और एक-एक करके गिनते हुए काउंटर पर रखे।

सहायता तथा अन्य कहानियाँ (संपादक : महेश्वर) से साभार 

 
 
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