तेरी शर्तों पे ग़ायब या नुमाया हो नहीं सकता
भले साज़िश से गहरे दफ़्न मुझ को कर भी दो पर मैं
सृजन का बीज हूँ मिट्टी में ज़ाया हो नहीं सकता...
कुमार विश्वास ने साहित्य के जरिए अपना ओज देकर सियासत को संघर्ष का नया कलेवर दिया । राष्ट्र हित, चरित्र, आचार-विचार और आपसी प्रेम के वैश्विक सद्भाव को सियासत का मूल आधार मानने वाले कुमार ने पूरे देश में साहित्य और राजनीति में एक नया तारतम्य स्थापित करने का अतुलनीय प्रयास किया है। लेकिन आज कुमार विश्वास को आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा के लिए पार्टी से उम्मीदवार नहीं बनाया है।
'कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है' जैसी एकांगी विरह की भाव रसमयी के साथ चर्चित होने वाले कुमार विश्वास को 2011 के अन्ना आंदोलन के दौरान जनता के साथ प्रत्यक्ष जुड़ने का मौका मिला। इसके बाद कुमार की आवाज में साहित्य और राजनीति से सृजन की वह हुंकार आज भी जारी है।
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कुमार लिखते हैं कि-
'उठा पलकों को जिसने दिन उगाया था फलक पर,
उसी की जुल्फ का रातों पे साया हो गया है...
नजर का एक टुकड़ा छत पर फेंका है किसी ने
जिसे पढ़ने में पूरा चांद जाया हो गया है'...
दिल है गर तू तो दिल का मैं एहसास हूं
विश्वास उनके शब्दों की नींव हैं। कंगूरों पर उनका ध्यान नहीं जाता। समस्याओं के निराकरण के लिए आधार पर चोट करना उनकी खासियत है। वो समझते हैं कि आधार पुख्ता होने से इमारत और कंगूरों का बेहतर होना स्वयंसिद्ध है।
कुमार राजनीतिक मंचों पर साहसिक और साहित्यिक सच को बयां करते हैं। वो कहते हैं साहसिक सत्य ! सुन सकें तो सुने और साहस जगे तो हर एक को भेजें। सोशल मीडिया के इस क्रांतिक दौर में अपने भावों का जन-जन में संचार करने के लिए कुमार काफी लालायित दिखते हैं। उनकी कविताएं और उनकी राजनीतिक गतिविधियां उन्हें एक स्वार्थरहित, ईमानदार और सच्चे जनआंदोनकारी कवि का दर्जा देती हैं।
कुमार की कविता...
"दूर है तू मगर मैं तेरे पास हूं
दिल है गर तू तो दिल का मैं एहसास हूं
प्रार्थना या इबादत या पूजा कोई
भावना है अगर तू मैं विश्वास हूं...!!!"
बेवजह अहम पाल रखा है, साथ में वहम पाल रखा है
इस कविता में कुमार का भाव उनका सांसारिक समन्वय दर्शाता है। अगर इस भाव के साथ राजनीतिक गतिविधियां क्रियान्वित हों तो किसी के साथ अन्याय नहीं होगा।
कुमार देश के शहीदों को सबसे ऊपर रखते हैं। शहीद भगत सिंह हो या झांसी की वीरांगना लक्ष्मीबाई सभी का यशोगान कुमार ने अपने वक्तव्यों में किया है। वह कहते हैं संवेदनाएं सरहद को भी नहीं पहचानती हैं।
इस भाव के साथ उन्हें जनप्रिय कवि कहा जा सकता है। शहीदों पर शब्द भाव समर्पित करने वाले कुमार ने गहन समस्याओं के लिए जन आंदोलन को अहम माना है।
कुमार किसी व्यक्तिवाद के पोषक नहीं है। वह किसी एक को सृजन या चमत्कार का मूल नहीं मानते। उनकी कलम में सामूहिक प्रयास और कर्म समाज को रौशन करते हैं। इससे सभी को राह मिलती है। व्यक्तिवाद पर तंज कसते हुए कुमार कहते हैं...
'बेवजह अहम पाल रखा है,
साथ में वहम पाल रखा है,
गिर के इस तरहा बात करता है,
जैसे सब कुछ संभाल रखा है'
राजनीतिक बदलाव के लिए कुमार सतत प्रयास पर जोर देते हैं। धड़कन के साथ कर्मों में धड़कते रहना उनकी काव्य चेतना का मूल उत्स है। उनकी कविताएं कहीं न कहीं राजनीतिक बोध को संघर्ष और समर्पण के बीच समन्वय देती हैं। वह लिखते हैं...
'नींद उनको मिली जिनका कोई भी ख़्वाब नहीं,
वो जिसे ख़्वाब मिले वो कभी सोता ही नहीं,
दर्द का रास्ता जो दिल के होके जाता है,
वहां से आगे कोई रास्ता होता ही नहीं'!