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Kavya Cafe : अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर सजेगी कविताओं की शाम

Sat, 04 Mar 2023 02:50 PM IST
काव्य डेस्क अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
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amar ujala - फोटो : amar ujala
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आगामी अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस को देखते हुए अमर उजाला 'काव्य कैफे' द्वारा 4 मार्च को साम 5 बजे  आयोजित कवि सम्पूमेलन पूर्णतया महिलाओं को समर्पित होगा। इस कार्यक्रम में केवल कवयित्रियाँ ही भाग ले रही हैं।  कार्यक्रम में शामिल होने वाली कवयित्रियों की रचनायें भी महिला विषयों पर ही आधारित होंगी। जो कवयित्रियाँ कार्यक्रम का हिस्सा होंगी वे हैं- 
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मुस्कान तिवारी
मुस्कान तिवारी दिल्ली से हैं। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से परास्नातक किया है। इनकी रचनाएं महिलाओं की सामाजिक स्थितियों पर आधारित होती हैं। इनकी कविताओं के कुछ अंश हैं-

 ये सभ्यता देती है
 प्रेम की नियमावली
जात,धर्म,बिरादरी,रंग
ऊंच-नीच और हां
बैंक-खाता देखकर
करते हैं प्रेम,
 नहीं पढ़ी नियमावली तो
यहां प्रेम विवाह से ज़्यादा
आम है हत्याएं, बलात्कार,
यातनाएं और बहिष्कार । 

बचपन से ये सुना कि 
एक औरत के पीछे होते रहे हैं युद्ध;
मैं बस तलाशने लगी वो औरत
जिसके पीछे छिपकर
युद्ध करते थे लोग
और इस तलाश में मिलती रही
तोहमतें,लानतें और कुछ बदचलन किस्से
 

अमृता अमृत
अमृता अमृत दिल्ली से हैं और दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत हैं।  ये महिलाओं द्वारा देश के उत्थान में दिये जा रहे योगदान पर कवितायें लिखती हैं। 

प्रेम त्याग सेवा से निर्मित मूरत स्वाभिमान की 
इस धरती की शान रही हैं बेटी हिंदुस्तान की
इनको तुम कमजोर ना समझो ये ममता की गंगा हैं
ये भारत की शान रही हैं इनका नाम तिरंगा है

जन-जन की सेवा की खातिर क्या-क्या रूप बदलती हैं
पड़े जरूरत तो कांटो और अंगारों पर चलती हैं 
मुश्किल में भी अडिग खड़ी हैं फौलादी चट्टान सी 
इस धरती की शान रही हैं बेटी हिंदुस्तान की
 

कनुप्रिया
कनुप्रिया दिल्ली से हैं। इन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया है। इनकी रचनायें महिलाओं की सामाजिक समस्याओं पर आधारित होती हैं। इनकी कविता की कुछ पंक्तियाँ हैं-

हम देखेंगे संताप बिछड़ी आंखों का 
 जो जानती हैं आधी औरत अपने पूरे अस्तित्व में है 
 जहाँ इंतज़ार में चल रही है
 आधी से आदी औरत 
 

रूपा राजपूत
रूपा राजपूत गाजियाबाद से हैं। इनकी कवितायें श्रृंगार रस से परिपूर्ण होती हैं। इनकी कविता का अंश है-

नारी हूँ अभियान नहीं, अभिमान बनाओ तुम
सज्जा की हूँ वस्तु नहीं, सम्मान बनाओ तुम

एक दूसरे के पूरक हम यह पहचानो तो
भोर, बिना दिनकर के सूनी यह तुम मानो तो।
देह बनो तुम और मुझे फिर प्राण बनाओ तुम
सज्जा की हूँ वस्तु नहीं, सम्मान बनाओ तुम

 
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प्रभजोत कौर
प्रभजोत कौर राजस्थान से हैं। ये अरविंद कालेज में अंग्रेजी साहित्य की शिक्षिका हैं। इनकी रचनाओं में महिला विषयों की प्रधानता होती है।  इनकी कविताओं की कुछ पंक्तियाँ हैं-

बेबसी' मेरे बिस्तर पर पड़ा एक अक्षर है 
मेरे घर के सामने एक कवि का घर है 
उसके घर मे कमरे चार 
एक बांसुरी, दो शंख, एक वीणा
और दो सितार 
नौ सौ चालीस किताबें 
लाखों कवितायेँ 
और अनगिनत एहसास 
मेरे घर मे बस एक बिस्तर 
और एक औरत मेरे पास 
( या मैं एक औरत के पास) 
ये बेपरवाह सुर जो अपना ठिकाना ढूँढ रहे हैं 
ये सब एहसास जो उसके आधे खुले दरवाज़े पर खड़े हैं
मै जब चीनी लेने जाऊंगा 
इन सबको अपने घर ले आऊंगा 
मेरे घर की चीनी रोज़ ख़त्म हो जाती है 
ये औरत मुझसे रोज़ चोरी करवाती है

जो तूने अपने मन की मिट्टी कुरेद कर दी थी 
अब मैं उस मिट्टी से अपना घर  बनाती हूं
जहाँ तू खुदको ढूंढ़ने जाया करता था 
उस दरगाह पर मै तुझे ढूंढने  रोज़ जाती हूं 
इन तावीज़, तड़प,  तसव्वुर, की गलियों में, मैं खुद से ही मिल जाती हूं 
फिर खुद से मिलकर कहती हूं की वो होता तो क्या होता ? 

कार्यक्रम अमर उजाला काव्य के यू-ट्यूब से लाइव जाएगा, कार्यक्रम देखने के लिए इस लिंक पर जाएं - 

https://www.youtube.com/channel/UCwsp8CqXY3v-Mu1FXV_YeDA
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