गिरिडीह जिले से अवैध रूप से प्राप्त किए गए माइका को कोलकाता पोर्ट के जरिये विदेश भेजे जाने की शिकायतों के बाद सीमा शुल्क विभाग ने माइका निर्यात की दस्तावेजी जांच को अत्यंत कड़ा कर दिया है। मुख्य सीमा शुल्क आयुक्त कार्यालय में 30 जुलाई 2026 को शिकायत मिलने और उसके बाद 20 अगस्त को रिमाइंडर भेजे जाने के उपरांत विभाग ने निर्यात से जुड़े आंकड़ों की गहन जांच की। इस पड़ताल में पाया गया कि अधिकांश माइका निर्यात कंसाइनमेंट में निर्यातकों ने ई-संचित पोर्टल पर मुख्य रूप से केवल इनवॉयस और पैकिंग लिस्ट ही अपलोड की थी। सीमा शुल्क विभाग के अनुसार, इन सामान्य दस्तावेजों के बल पर माइका के वैध स्रोत की पर्याप्त पुष्टि नहीं हो पाती है।
जांच प्रक्रिया में अतिरिक्त दस्तावेज अनिवार्य
अवैध कारोबार रोकने के लिए सीमा शुल्क विभाग की स्पेशल इंटेलिजेंस एंड इन्वेस्टिगेशन ब्रांच (एसआईआईबी), पोर्ट ने चैप्टर 25 के तहत आने वाले रॉ, क्रूड या सेमी-प्रोसेस्ड माइका के निर्यात में अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने की नई व्यवस्था लागू की है। इस विशेष कदम का मुख्य उद्देश्य निर्यात किए जा रहे माइका के मूल स्रोत और उसकी खरीद की वैधता की निष्पक्ष जांच करना है। नए निर्देशों के अनुसार, माइका निर्यातकों को अब माइन सोर्स सर्टिफिकेट, माइनिंग ई-चालान अथवा ट्रांसपोर्ट चालान, संबंधित टैक्स इनवॉयस और ई-वे बिल जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करने होंगे। इन रिकॉर्ड के आधार पर ही सीमा शुल्क विभाग माइका के स्रोत और उसके परिवहन से जुड़े विवरणों का सत्यापन कर सकेगा। कस्टम हाउस, कोलकाता की एसआईआईबी (पोर्ट) द्वारा जारी कार्यालय नोट में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि कोई निर्यातक ये आवश्यक दस्तावेज जमा नहीं करता है तो मामला एसआईआईबी (पोर्ट) के संज्ञान में लाया जाएगा। इसके बाद यह शाखा उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर आगे की जांच तथा आवश्यक कार्रवाई करेगी।
अवैध खनन और डंपिंग के आरोप
गिरिडीह के तिसरी, गावां और खोरीमहुआ अनुमंडल क्षेत्रों में माइका के अवैध खनन और गैर-कानूनी कारोबार की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। स्थानीय स्तर पर माइका के स्क्रैप को ‘ढिबरा’ के नाम से भी जाना जाता है। शिकायतों के अनुसार, जंगलों और अन्य क्षेत्रों से रात के समय अवैध तरीके से माइका निकालकर उसकी डंपिंग की जाती है और बाद में उसे दूसरे क्षेत्रों में भेज दिया जाता है। हालांकि, स्थानीय प्रशासन समय-समय पर ऐसे मामलों में कार्रवाई करता रहा है। इसके अतिरिक्त, माइका कारोबार से जुड़े लोगों पर यह गंभीर आरोप भी लगते रहे हैं कि वे गिरिडीह क्षेत्र से प्राप्त माइका को दूसरे राज्यों के स्रोत का बताकर दस्तावेजों में वैध दिखाने का प्रयास करते हैं। हालांकि, सीमा शुल्क विभाग के अधिकारियों का मानना है कि ऐसे आरोपों की पुष्टि प्रत्येक मामले में जांच और दस्तावेजी सत्यापन के बाद ही की जा सकती है।
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बंद खदानों के बीच जारी व्यापार
चाइल्ड इन नीड इंस्टीट्यूट के एक पुराने अध्ययन में वन विभाग के आंकड़ों के हवाले से गिरिडीह में माइका के सालाना कारोबार का अनुमान करीब 300 करोड़ रुपये लगाया गया था। हालांकि, यह आंकड़ा पुराने अध्ययन से संबंधित है और इसे वर्तमान कारोबार का प्रत्यक्ष आकलन नहीं माना जा सकता है। वर्ष 1980 के दशक में वन संरक्षण कानून लागू होने के बाद इस क्षेत्र की अधिकांश माइका खदानों को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया गया था। इसके बावजूद क्षेत्र में माइका संग्रह और इसके व्यापार की गतिविधियां लगातार जारी रहने की बात विभिन्न रिपोर्टों में सामने आती रही हैं। सीमा शुल्क विभाग द्वारा की गई इस सख्ती से अब निर्यात के स्तर पर माइका के स्रोत और उसकी खरीद से संबंधित दस्तावेजों की जांच को अधिक प्राथमिकता मिलने की उम्मीद है।