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Refugee Day: पीओजेके के लोगों का दर्द; 370 रहते भी इंसाफ नहीं मिला, हटने के बाद भी भटकना पड़ रहा

Tue, 20 Jun 2023 04:59 PM IST
जम्मू और कश्मीर ब्यूरो अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

कबायली हमले के बाद मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित, छंब आदि इलाकों से भारी संख्या में लोग यहां आए। ज्यादातर लोग जम्मू कश्मीर में बस गए। इनकी तादाद 12 लाख बताई जाती है।
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Refugee Day - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कबायली हमले के बाद 1947 से विस्थापन का दर्द झेल रहे पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर (पीओजेके) के निवासियों का दर्द उस समय और बढ़ जाता है जब उन्हें 75 साल बाद भी किसी प्रकार का दर्जा नहीं मिल पाया। उनका दर्द है कि वे न तो रिफ्यूजी की श्रेणी में हैं और न ही विस्थापितों की। सरकार की ओर से उन्हें न तो रिफ्यूजियों और न ही विस्थापितों की सुविधाएं दी जाती हैं। जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के रहते भी उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाया, और अब जब 370 हट गया तब भी उन्हें इंसाफ के लिए भटकना पड़ रहा है।

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कबायली हमले के बाद मीरपुर, मुजफ्फराबाद, गिलगित, छंब आदि इलाकों से भारी संख्या में लोग यहां आए। ज्यादातर लोग जम्मू कश्मीर में बस गए। इनकी तादाद 12 लाख बताई जाती है। कई परिवार उत्तर प्रदेश, दिल्ली, पंजाब, राजस्थान के अलावा अन्य प्रदेशों में भी गए। जम्मू कश्मीर से बाहर लगभग पांच लाख लोग रहते हैं। इनका कहना है कि रिफ्यूजी या विस्थापित का दर्जा न मिलने की वजह से उन्हें न तो सरकार की ओर से मुफ्त राशन की सुविधा उपलब्ध हो पाती है और न ही बिजली बिल में किसी प्रकार की छूट। वे बिजली बिल भी देते हैं और आयकर भी जमा करते हैं।

कई बार सरकार से गुहार लगाई गई, लेकिन इसे अनसुना कर दिया गया। विपक्ष में रहते हुए भाजपा नेता राजनाथ सिंह के समक्ष यह मामला उठाया गया था कि रिफ्यूजी आयोग का गठन किया जाए ताकि सिंगल विंडो सिस्टम से उनकी समस्याओं का हल एक ही जगह हो जाए। लेकिन इस पर भी कोई काम नहीं हो पाया। पीओजेके के लोगों की राजनीतिक रूप से नुमाइंदगी न होने की वजह से उनकी आवाज अनसुनी कर दी जाती है। इसलिए कई फोरम पर राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की आवाज भी उठाई गई, लेकिन इस पर कोई पहल परवान नहीं चढ़ सकी।
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पीओजेके विस्थापितों की संस्था एसओएस इंटरनेशनल के चेयरमैन राजीव चूनी का कहना है कि समाज के लोग किसे अपना दर्द सुनाएं। कोई उनकी फरियाद सुनकर उस पर अमल नहीं करता। समाज के लोगों को तो अपनी माटी से जुड़ने का मौका मिलना सपना लगता है, कम से कम यहां तो उन्हें सम्मान की जिंदगी जीने का मौका मिलना चाहिए। अब भी उन्हें अपनी पहचान का इंतजार है।

25-25 लाख देने का प्रस्ताव किया था पास

एसओएस के चेयरमैन बताते हैं कि काफी संघर्षों के बाद अक्तूबर 2014 में तत्कालीन उमर सरकार ने पीओजेके के लोगों को एकमुश्त 25-25 लाख रुपये देने का फैसला किया था। साथ ही कश्मीरी पंडितों के बच्चों की तरह तकनीकी संस्थानों में दाखिला के लिए आरक्षण का प्रावधान भी किया गया था, लेकिन अब भी उन्हें इसका इंतजार है। मोदी सरकार ने साढ़े पांच लाख रुपये सहायता देने की घोषणा की। यह राशि तीन महीने में बंट जानी चाहिए थी, लेकिन अब भी समाज के सभी लोगों को यह राशि नहीं मिल पाई है।

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