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जम्मू-कश्मीर : घाटी में कश्मीरियत की मिसाल बना एलओसी से सटा गांव टीटवाल, यहां हैं सौहार्द की और भी निशानियां

Sat, 09 Apr 2022 04:26 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमृतपाल सिंह बाली, श्रीनगर/टीटवाल

सार

1947 से संभालकर रखी शारदा पीठ की जमीन मुस्लिम समुदाय ने पिछले साल की थी कश्मीरी पंडितों के हवाले। मंदिर निर्माण के लिए बनाई गई कमेटी में तीन कश्मीरी पंडित और गांव के दो मुसलमान भी शामिल हैं। 
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शारदा मंदिर के निर्माण में लगे श्रमिक... - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कश्मीर घाटी में नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर बसा और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) से मात्र 500 मीटर दूर टीटवाल गांव कश्मीरियत की मिसाल पेश कर रहा है। पिछले साल इस गांव के मुस्लिम समुदाय के लोगों ने शारदा पीठ की जमीन कश्मीरी पंडितों को सौंपी थी, जिस पर मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है। यहां एक मस्जिद और एक गुरुद्वारा भी बनाया जा रहा है। मंदिर के निर्माण के लिए बनाई गई कमेटी में तीन कश्मीरी पंडित और इसी गांव के दो मुसलमान शामिल हैं।

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वर्ष 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद हुए कबाइली हमलों में कुपवाड़ा जिले के टीटवाल स्थित प्राचीन शारदा पीठ के मंदिर, सराय और गुरुद्वारे को नुकसान पहुंचा था। तब से यह भूमि वीरान थी। हालांकि गांव के लोगों ने इसे संभालकर रखा था। सितंबर 2021 में जब कश्मीरी पंडित वार्षिक शारदा पीठ यात्रा के तहत किशनगंगा दरिया के घाट पर पहुंचे, तो टीटवाल निवासियों ने उन्हें यह जमीन सौंप दी। दिसंबर में यहां भूमि पूजन किया गया था। 28 मार्च को गांव में शारदा मंदिर बनाने का काम शुरू हुआ। 

सेवा शारदा कमेटी (एसएससी) के अध्यक्ष रविंद्र पंडिता ने कहा कि यह हमारी पुरानी जगह थी, जहां शारदा मंदिर बना रहे हैं। हम 14 सितंबर, 2021 को यात्रा पर आए थे। दो-तीन साल से पारंपरिक रास्तों से यात्रा शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं। इसमें, केरन, गुरेज, लिदरवन जुमागड़ के रास्ते हैं। एक रास्ता टीटवाल का भी है। इसकी मान्यता इसलिए ज्यादा है, क्योंकि यह ऑफिशियल रूट है। यहां से 1947 तक छड़ी मुबारक जाया करती थी। हमारे गुरु नंदलाल जी 1948 तक शारदा पीठ में रह रहे थे। इसके बाद वह कुपवाड़ा के टिकर आ गए।
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शिंगेरी मठ से तराशे हुए पत्थर आएंगे 
रविंद्र पंडिता ने कहा कि स्थानीय लोगों ने 14 सितंबर को हमें जमीन दी थी। इसके बाद निशानदेही की गई। हम चाहते हैं कि 1947 से पहले की तरह यहां गुरुद्वारा और धर्मशाला बने। उन्होंने कहा कि शारदा पीठ यात्रा का अहम बेस कैंप है। हमारी कोशिश है दोनों (भारत और पाकिस्तान) तरफ  से राहदारी खोलने का। उसमें यह बड़ा कदम है। मंदिर के लिए शिंगेरी मठ से तराशे हुए पत्थर आएंगे और भव्य मंदिर बनेगा। उम्मीद है कि यहां से फिर छड़ी मुबारक वैसे ही रवाना होगी, जैसे पहले होती थी।

तीनों समुदाय मिलकर बना रहे इंसानियत का मजहब 
टीटवाल के निवासी कहते हैं कि यह हिंदुओं की अमानत थी, जिसकी सात दशक उन्होंने रखवाली की। वे चाहते हैं कि फिर से वही माहौल बने और सब मिलकर रहें। स्थानीय निवासी और सेव शारदा कमेटी के सदस्य एजाज अहमद ने कहा कि 1947 के बाद कबाइलियों ने मंदिर को जला दिया था, जिसे फिर से बनवा रहे हैं। यहां मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारा बना रहे हैं। तीनों समुदाय के लोग एक नया इंसानियत का मजहब बना रहे हैं। यह टीटवाल गांव से दुनिया को एक संदेश होगा। हम एक नई शुरुआत करेंगे। 300 मीटर की दूरी पर पाकिस्तान है और यहां हमारा बेस सेंटर है। उम्मीद है कि यहां निर्माण कार्य खत्म होने के बाद कश्मीरी पंडित भाई आएंगे। इसके बाद सितंबर के महीने में यहां से छड़ी मुबारक रवाना होगी। 

देवी सरस्वती का कश्मीरी नाम है शारदा पीठ
शारदा पीठ देवी सरस्वती का कश्मीरी नाम है। यह पीओके के शारदा जिले में हैं। यह जगह कश्मीरी पंडितों और आदि शंकराचार्य को मानने वालों के लिए सबसे ऊंचा तीर्थ स्थान है। यहां 1948 तक वार्षिक यात्रा होती थी। यह एक मंदिर ही नहीं, बल्कि शारदा पीठ दुनिया के प्रमुख प्राचीन विश्वविद्यालयों में सबसे पुराना विश्वविद्यालयों में जाना जाता है।

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