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बाढ़ के बाद कश्मीर में फैली ये कैसी बीमारी?

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जम्मू-कश्मीर में आई भयानक बाढ़ के बाद घाटी के लोगों को एक नई बीमारी ने जकड़ लिया है। बाढ़ पीड़ितों में पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (किसी घटना के बाद लगा सदमा) के लक्षण पाए जा रहे हैं।
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मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि, घाटी में बाढ़ के बाद से इस तरह के मामलों के मरीजों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है। श्रीनगर में प्रैक्टिस करने वाले एक मनोवैज्ञानी का कहना है कि, बाढ़ पीड़ितों में पीटीएसडी के शुरूआती लक्षण देखे जा रहे हैं।

पीटीएसडी एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें किसी शारीरिक अवधात या हादसा होने के बाद रोगी को मानसिक आधात लगता है।

रह-रह कर याद आता है बाढ़ का मंजर

जानकार बताते हैं कि पीटीएसडी के मरीज किसी भी घटना (जिसके बारे में कभी सोचा ना हो कि ऐसा कभी हो सकता है) के बाद उसके सदमे से बाहर नहीं आ पाते हैं और हर समय उसी बारे में सोचते रहते हैं।

उन्हें हर समय उसी घटना से जुड़ी हुई तस्वीरें द‌िखती रहती हैं और दिमाग में हमेशा उसी से जुड़े विचार आते रहते हैं। वह चाह कर भी इससे बाहर नहीं आ पाते।

इस अवस्‍था में ना तो वह सो पाता है ना ही भूख लगती है इस कारण धीरे-धीरे स्वास्‍थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

डॉक्टर बोले, बदल गए पीटीएसडी के मरीज

श्रीनगर के एक मेड‌िकल कैंप में काम कर रहे डॉक्टर बशीर अहमद का कहना है कि अकसर ऐसा सदमा तब लगता है जब व्यक्ति अपने किसी करीबी को खो दे या किसी भयानक हादसे को होते हुए देख ले। उनके अनुसार ऐसे मरीजों को अकसर दौरे पड़ते हैं।

कैंप के ही एक अन्य डॉक्टर वसीम वानी का कहना है कि, इससे पहले जो पीटीएसडी के मरीज आ रहे थे वह घाटी में हो रही उथलपुथल (आतंकी घटनाओं से जुड़ी) से पीड़ित थे जिन्होंने कभी ना कभी अपने करीबी लोगों को अपने सामने मरते देखा हो।

लेकिन अब जो मरीज हमारे पास आ रहे हैं उनमें से अधिकतर ऐसे हैं जो बाढ़ की भयानक यादों को भुला नहीं पा रहे हैं। बाढ़ का भयानक मंजर रह रहकर उनकी आंखों के सामने आ रहा है।
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तीन महीने की बजाए 15 दिन में ‌द‌िखे लक्षण

डॉक्टर्स का कहना है कि अकसर ऐसे मरीजों को घटना या हादसे के करीब एक महीने बाद ट्रॉमा के लक्षण आने शुरू होते हैं, इसलिए मरीजों की संख्या बढ़ने और मरीजों की हालत बिगड़ने से पहले ही उनका उपचार करने का प्रयास किया जा रहा है।

डॉक्टर बशीर अहमद का कहना है कि पीटीएसडी के मरीज में ट्रॉमा के पूरे लक्षण करीब तीन महीनों में दिखते हैं लेकिन घाटी में अधिकतर मरीजों में अभी से इस बीमारी के लक्षण देखे जा रहे हैं।
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