मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं का ऐसा मंचन विरले ही देखने को मिलता है। कला नगरी बसोहली में सौ साल पूरे कर चुकी रामलीला की परंपरा इस बार भी उत्साह के साथ आगे बढ़ने को लालायित है। ऐतिहासिक होने के साथ-साथ बसोहली की रामलीला कई मायनों में अलग है।
11 अक्तूबर, 1912 को शुरू की गई रामलीला ने एक सदी का समय पूरा कर लिया है, लेकिन उसके पारंपरिक स्वरूप और सामाजिक समरसता की मिसाल बदस्तूर कायम है।
शारदीय नवरात्र के उपलक्ष्य पर हर साल आयोजित होने वाले महा आयोजन में न सिर्फ बसोहली नगरी और आसपास के ग्रामीण इलाकों से लोग पहुंचते हैं बल्कि पड़ोसी राज्य पंजाब तक से लोगों को रामलीला उन्हें बसोहली खींच लाती है।
खुले आसमान तले सजने वाले राम दरबार हों या फिर एक से बढ़कर एक दृश्यों का वशीभूत करने वाला मंचन। रात के अंधेरे को रोशन करती रामलीला की चकाचौंध में हजारों दर्शकों की आंखें एकटक दृश्यों से तारतम्य बिठाए रहती हैं।