कारगिल युद्ध की जीत का जश्न हर साल मनाया जाता है लेकिन जीत को परवान चढ़ाने में शहादत पाने वालों को सम्मान देने में रियासती सरकार विफल रही है।
कारगिल के शहीदों को सम्मान देने के लिए बेशक हर साल विजय दिवस मनाया जाता हो लेकिन कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिनके जख्म इस दिन हरे हो जाते हैं। उन्हें मलाल रह जाता है अपनों की शहादत के रुसवा होने का।
12 जैक लाई के शहीद हवलदार अब्दुल करीम का परिवार भी इस हर साल कुछ ऐसी ही टीस महसूस करता है। केंद्र सरकार ने पेट्रोल पंप की सुविधा देकर परिवार को आर्थिक सहारा दिया तो सेना भी हर तिमाही पर एक टीम भेजकर अपने शहीद के परिवार का हाल चाल जान लेती है।
अब तक पूरा नहीं हुआ रोजगार का वादा
लेकिन इस परिवार को दर्द है तो सिर्फ इस बात का की अपना होने का दंभ भरने वाली राज्य सरकार ने आज तक उनकी सुध नहीं ली।
शहीद हवलदार अब्दुल करीम के बेटे अब्दुल रफीक ने बताया कि उनके पिता ने दुश्मन से लोहा लेते हुए 1 जुलाई 1999 को शहादत पाई थी।
अब्दुल करीम की पत्नी गुड्डी बेगम और बेटी नसरीन अख्तर ने बताया कि मूल रूप से उनका परिवार उधमपुर जिले का रहने वाला है लेकिन उन दिनों वह कठुआ के तारानगर इलाके में किराए के मकान में रह रहे थे।
केन्द्र और सेना ने रखा पूरा ख्याल
घर के मुखिया की शहादत ने परिवार सदस्यों को झकझोर कर रख दिया था, लेकिन केंद्र सरकार और सेना ने जिस तरह से उन्हें सम्मान और सहायता दी उससे उन्हें एहसास हुआ कि देश के लिए मर मिटने वालों की अहमियत है।
इसके उलट जब वह राज्य सरकार की ओर देखते हैं तो उन्हें मायूसी ही हाथ लगती है। शहीद के परिजनों ने बताया कि घर के किसी एक सदस्य को रोजगार देने का भरोसा दिलाया गया था जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है।
जो भी मदद मिली है वह केंद्र सरकार और सेना की ओर से ही मिल पाई है। उन्होंने कहा कि वह घर के किसी सदस्य को नौकरी और राज्य सरकार द्वारा सरकारी समारोह में सम्मान की आस रखते हैं।
बलिदान बड़ी बात पर सरकार भी तो करे याद
गांव कोटली शाहदौला के शहीद लांस नायक देवेंद्र सिंह के माता-पिता ने सरकार और सेना द्वारा मान-सम्मान न देने पर दुख जताया है। माता कुलदीप कौर और पिता रवैल सिंह ने कहा कि देवेंद्र छह जुलाई 1999 में आठ सिख रजिमेंट में तैनात थे।
आज 15 वर्ष बीत जाने के बाद न तो राज्य सरकार न ही सेना ने उन्हें कभी किसी समारोह में बुलाया। रवैल सिंह का कहना है कि वह भी सेना में थे। उनसे प्रेरित होकर ही तीनों बेटे सेना में भर्ती हुए। देवेंद्र तीनों में सबसे बड़ा था।
उन्होंने कहा कि देश की खातिर बलिदान देना बड़ी बात है, लेकिन सरकार और सेना को भी वीर सपूतों की शहादत याद रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्ष 1971 के जंग के दौरान उन्हें भी कारगिल में दुश्मन को सबक सिखाने का मौका मिला था।
उसी स्थान पर बेटे देवेंद्र ने दुश्मनों को कड़ी टक्कर देकर परचम लहराया। इस पर परिवार को गर्व है, लेकिन पिछले 15 वर्षों के दौरान सेना और राज्य सरकार द्वारा उन्हें सम्मान तक नहीं दिया गया, जिसका उन्हें दुख है।
उन्होंने कहा कि कारगिल संघर्ष के दौरान अगर दुश्मनों पर एयर अटैक किया जाता, तो सेना के कई जवानों की जान बचाई जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
दुखों को बांटने कोई नहीं आता
आठ सिख रेजिमेंट के शहीद देवेंद्र सिंह की पत्नी बलजीत कौर का कहना है कि उसका बेटा अपने पिता को नहीं देख पाया, क्योंकि शहादत के बाद बेटा युद्धवीर सिंह का जन्म हुआ। अब वह 15 वर्ष का हो गया है।
शिक्षा प्राप्त करने के लिए सरकार की ओर से युद्धवीर को कोई विशेष सुविधा नहीं मिली। रुटीन के मुताबिक ही सेना के जवानों और अधिकारियों के लोगों को मिलने वाली सुविधा ही मिल रही है। उन्होंने कहा कि सरकार को चाहिए था कि देश की खातिर बलिदान देने वाले जवानों के बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती।
शहीद जवानों के बच्चों को सरकारी नौकरियों में विशेष छूट देने की भी मांग की, ताकि उन्हें रोजी-रोटी के लिए भटकना नहीं पड़े। साथ ही यह महसूस न हो कि उनके सिर पर पिता का हाथ नहीं है।
वहीं आठ सिख रेजिमेंट के सिपाही शहीद बलविंदर सिंह के पिता गुरनाम सिंह और मां कमलजीत कौर का कहना है कि सरकार की ओर से बेटे के शहीद होने पर सबकुछ मिला, लेकिन आज भी जब उसकी याद आती है, तो मन बेचैन हो जाता है। बेटे को लेकर कई सपने बुने थे, उनके बिखरने का का दुख सदा रहेगा।
देश की रक्षा करने के लिए बलविंदर ने जान की बाजी लगा दी। उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों में न तो कोई नेता उनके पास आया न ही सेना के अधिकारी।
कभी भी पानी में बह सकती है शहीद की प्रतिमा
सीमावर्ती गांव कंगबाला के कारगिल शहीद सूबेदार गिरधारी लाल की प्रतिमा कभी भी पानी में बह सकती है। इसकी न तो जिला प्रशासन न ही किसी राजनेता ने अब तक सुध ली है।
शहीद सूबेदार की पत्नी प्रकाशो देवी ने बताया कि उनके पति ने कारगिल में देश की रक्षा की खातिर कुर्बानी दी, लेकिन उनकी प्रतिमा के रख रखाव तक की किसी को चिंता नहीं है। उन्होंने बताया कि प्रतिमा कंगबाला के नजदीक बनाई गई, लेकिन ग्रेफ विभाग ने शहीद की प्रतिमा के निकट ही पुली बनाई है।
बरसात में नाले का बहाव तेज होने पर प्रतिमा के उसमें बहने की आशंका बनी रहती है। उन्होंने बताया कि इस बाबत जिला प्रशासन के साथ स्थानीय विधायक को भी अवगत करवाया गया था, लेकिन प्रतिमा की सुरक्षा के लिए ठोस प्रयास नहीं किए गए। इस संबंध में अब तक केवल आश्वासन ही मिले हैं।
यही नहीं, शहीदी दिवस पर भी अब राजनेता और जिला प्रशासन के अधिकारी पहुंचने से कतराते हैं। केवल सेना के जवान ही पहुंच कर कार्यक्रम का आयोजन करते हैं। उन्होंने केंद्र सरकार से अपील की है कि कारगिल में शहीद होने वाले जवानों के परिवारों की भी सुध ली जाए।