सेक्युरिटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट (सरफेसी) को रियासत में लागू करने के मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष में दायर 550 याचिकाओं के मामले में हाईकोर्ट की जस्टिस अत्तर और जस्टिस मागरे की खंडपीठ द्वारा 74 पृष्ठों पर आधारित अपना फैसला सुनाया गया है।
इसमें कहा गया है कि यह कानून जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं है और न लागू हो सकता है। जम्मू-कश्मीर की अपनी ही एक संवैधानिक स्थिति है। हाईकोर्ट की ओर से कहा गया है कि संसद को वह कानून बनाने का अधिकार नहीं है जो धारा 13, 17 (ए), 18 (बी), 34, 35 और 36 के अनुसार हो और जम्मू-कश्मीर से संबधित हों।
बैंकों द्वारा सरफेसी अधिनियम की धारा 13 के तहत जारी नोटिसों को खारिज करते हुए अदालत ने बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानों की राज्य के स्थायी नागरिकों के खिलाफ उक्त अधिनियम के तहत कार्रवाई पर रोक लगाई है।
हालांकि, अदालत ने इस बात की स्वतंत्रता दी है कि वह ग्राहकों से रकम प्राप्त कर सकते हैं लेकिन उचित कानून और प्रक्रिया व संबंधित संस्था के अंतर्गत रहते हुए।
जम्मू-कश्मीर अपने आप में एक वर्ग है
अपने फैसले में अदालत ने कहा है कि जम्मू-कश्मीर राज्य चाहे तो सरफेसी की तरह कोई कानून बैंकों के हितों की सुरक्षा के लिए अपना सकता है लेकिन वह कानून किसी भी तरह से राज्य के स्थायी नागरिकों के हितों के खिलाफ न हो और उसमें उनकी संपत्ति गैर रियासती बाशिंदों को हस्तांतरित न हो सकती हो।
हाईकोर्ट द्वारा प्रेमनाथ कौल मामले में आए फैसले का उदाहरण देते हुए कहा गया कि जम्मू-कश्मीर में अद्वितीय, प्रमुख और विशेष स्थिति है, तो कानून की नजर में जम्मू-कश्मीर अपने आप में एक वर्ग है और देश के अन्य राज्यों के साथ इसकी तुलना नहीं हो सकती।
भारतीय संसद जम्मू-कश्मीर के बारे में कानून बनाने का विकल्प रखती है लेकिन यह इस बात के अधीन है कि राज्य से अनुमति मिलने के बाद ही ऐसा किया जा सकता है। इसके लिए वही तंत्र होगा जो अनुच्छेद 370 में दिखाए गए नियम के अनुसार होगा।
बैंक कानून 370 के तहत ही बना सकते हैं
भारतीय संविधान को राज्य में लागू करने की सीमाओं पर सवाल उठाते हुए अदालत ने कहा कि राज्य में केंद्रीय कानून लागू करने के लिए अनुच्छेद 370 में स्पष्ट रूप से निर्धारित प्रक्रिया का जिक्र है।
खंडपीठ ने कहा कि कें द्र सरकार भारतीय संविधान के प्रावधानों या कानून को एकतरफा तौर पर राज्य में लागू करने का अधिकार नहीं रखती। लेकिन राज्य सरकार के साथ परामर्श के बाद ऐसा किया जा सकता है।
हालांकि इस बात का संकेत है कि भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची पहले की 45वीं प्रविष्टि, जो जम्मू-कश्मीर में लागू है के तहत संसद को अनुच्छेद 370 द्वारा प्रस्तावित किए गए तंत्र और प्रक्रियाओं के अनुसार बैंक निवेश के बारे में कानून बनाने का अधिकार है। लेकिन उसे आपूर्ति न्याय, जमीन और अचल संपत्तियों के बारे में कानून बनाने का अधिकार नहीं है।
अनुच्छेद 35A द्वारा दिया गया विशेष राज्य का दर्जा
इसके अलावा अदालत ने यह भी माना कि राज्य की संप्रभुता को किसी भी हाल में न तो खारिज किया जा सकता है और न ही इसे चुनौती ही दी जा सकती है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 35 (ए) में पहले ही जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान द्वारा दिए गए विशेष राज्य और विशेषाधिकारों का स्पष्टीकरण कर दिया गया है।
अदालत ने कहा कि उक्त अनुच्छेद में इन आधारों का कानूनी स्पष्टीकरण भी किया गया है। अदालत का यह ताजा आदेश इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संघ समर्थित एक थिंक टैंक, जम्मू-कश्मीर स्टडी सेंटर, अनुच्छेद 35 (ए) की संवैधानिक वैद्यता को जल्द ही चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।
उक्त अनुच्छेद के मुताबिक जम्मू-कश्मीर निवासियों के अतिरिक्त कोई भी और राज्य में न तो जमीन खरीद सकता है और न ही किसी और तरह की ही कोई अचल संपत्ति खरीद सकता है।