जम्मू। अफगानिस्तान में तालिबान राज में महिलाओं पर लगाई जा रही तमाम बंदिशों से जम्मू-कश्मीर की आधी आबादी चिंतित है। यहां की महिला बुद्धिजीवियों, गृहणियों एवं कॉलेज-विश्वविद्यालय की छात्राओं ने अफगान महिलाओं के हक में आवाज बुलंद की है। उनका कहना है कि महिलाओं की भी समाज में बराबर की भागीदारी है। जिस प्रकार से उन्हें रूढ़ियों के जाल में फंसाया जा रहा है उससे उन्हें आजाद करने के लिए पूरी दुनिया को एकसाथ आगे आना चाहिए।
महिलाओं के अधिकारों पर इतना बड़ा आघात हुआ है फिर भी कोई संगठन सामने नहीं आया जो उनके हितों के बारे में आवाज उठाएं। आखिर क्यों? क्या इसकी सिर्फ यही वजह है कि यह विदेश का मामला है। अमेरिका की पहली उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की बात करें तो उनका जीवन महिलाओं के लिए काम करते करते गुजरा है परंतु इस मामले पर अभी तक उनका भी कोई बयान सामने नहीं आया। जब कभी महिलाओं पर अत्याचार का कोई मामला सामने आता है तो हम उसे महिलाओं के अधिकारों का हनन कहते हैं परंतु जब अफगानिस्तान पर बात आती है तो हम कहते हैं कि यह उनका मामला है और यह उनकी संस्कृति है आखिर क्यों? लोग अपनी दोहरी मानसिकता कब तक रखेंगे। तख्तापलट के बाद तालिबान ने कहा था कि उन्हें महिलाओं के नौकरी करने से कोई आपत्ति नहीं है परंतु 24 घंटे में ही सरकारी एंकर खादिजा अमीन को नौकरी से हटा दिया गया। महिलाओं का सजना-संवरना बंद करने से लेकर उनके मुंह पर कालिख पोत देना, यह सब कहा का इंसाफ है।
- अमिता मेहता, हिंदी साहित्यकार
कोई धर्म यह नहीं कहता कि लोगों पर अत्याचार करो, परंतु यह लोग धर्म की आड़ में महिलाओं पर अत्याचार किए जा रहे हैं। कोई भी देश अफगानिस्तान की मदद करने के लिए आगे नहीं आ रहा। वहां की महिलाओं के लिए यह एक बहुत बड़ा संघर्ष है क्योंकि तालिबान के पिछले शासन में महिलाओं का जीना बहुत मुश्किल हुआ था। महिलाओं को किसी भी तरह की आजादी नहीं थी। जब हम अफगानिस्तान में रह रही महिलाओं को देखते हैं तो हम अपने आप को भाग्यशाली मानते हैं कि हम उस देश में रहते है जहां हमें पूरी आजादी है। उन महिलाओं के लिए तो सब कुछ मानो बदल सा गया हो, जो रोज सुबह काम पर जाती थीं, लोगों क ो प्रेरित करती थीं आज उन्हीं महिलाओं को अपनी जान बचाने के लिए छुपना पड़ रहा है।
- डा. अर्चना कुमारी-सहायक प्रोफेसर, केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू
आज के युग में हम महिला सशक्तीकरण की बात करते हैं और महिलाओं क ो समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाने के लिए प्रेरित करते हैं। लेकिन अगर तालिबानी समाज में महिलाओं को दोयम दर्जे का बताने की घटनाएं होती रहेंगी तो कोई भी महिला अपने आप को कैसे सुरक्षित मानेगी। इस प्रकार की घटनाएं चाहें विश्व के किसी भी कोने में हो, उसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है। पूरे समाज में
- सोनाली, छात्रा-इग्नू
एक तरफ कहा जाता है कि पूरे विश्व में महिलाएं समाज में बदलाव लाने का काम कर रही हैं। वहीं दूसरी ओर अफगानिस्तान में महिलाओं के ही अधिकारों को छीन लिया गया है। यदि महिलाओं के साथ इसी तरह के अत्याचार होते रहेंगे तो वह समाज में बदलाव लाना तो दूर खुद को बचाने में भी असमर्थ रहेंगी। सभी लोगों को तालिबानी महिलाओं के समर्थन में आगे आना चाहिए।
- दामिनी पड़याल, छात्रा-जेके कॉलेज
21वीं शताब्दी में रहते हुए हम बात करते हैं कि समाज में समानता होनी चाहिए परंतु अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के साथ-साथ रुढ़िवादी सोच भी वापस आ गई है। जहां महिलाओं के अधिकारों का सीधा-सीधा हनन हो रहा है। महिलाओं को तो हाथों की कठपुतली बना कर रख दिया गया है, जो सरासर गलत है।
- पलक शर्मा, छात्रा-केंद्रीय विवि
जब क ोई जबरदस्ती हिंसा द्वारा किसी देश पर अधिकार कर ले तो वो किसी राष्ट्र का जातीय मामला नहीं रह जाता। ऐसे हालात में सभी देशों क ो एकत्रित होकर वहां की जनता की मदद के लिए आगे आना चाहिए, ताकि उनक ो जल्द से जल्द उनके आतंक से मुक्त कराया जा सके। इस राजनीतिक जंग से आम जनता पिस रही है और इसमें मुख्य रूप से महिला वर्ग प्रभावित हो रहा है। उनके अधिकारों का हनन हो रहा है। - ज्योति, छात्रा-केंद्रीय विश्वविद्यालय जम्मू
हमने अक्सर देखा है कि पुरुष प्रधान समाज में महिलाओं के साथ भेदभाव हमेशा से होता ही रहा है। यह पूरी तरह से गलत है। महिलाओं क ो भी शिक्षा, रोजगार की आजादी होनी चाहिए। जब-जब किसी महिला ने इसके खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की उनकी आवाज क ो दबा दिया गया। जहां तक तालिबान में महिलाओं की आजादी का सवाल है तो इसके लिए उन्हें खुद ही आगे आना होगा। तभी एक सकारात्मक बदलाव देखने क ो मिलेगा। पूरे विश्व समुदाय को भी अपनी चुप्पी तोड़नी होगी।
- तानिया डगोरिया, छात्रा, जम्मू विश्वविधालय