महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के दावों का खोखलापन देखना हो तो रियासत में होने जा रहे विधानसभा चुनाव पर नजर डालना ही काफी होगा। पहले चरण में 15 सीटों पर 123 प्रत्याशी अखाड़े में उतरे हैं।
इनमें एक भी महिला प्रत्याशी नहीं है। न तो किसी राष्ट्रीय दल को और न ही क्षेत्रीय दल को एक भी महिला ऐसी नजर नहीं आई जिसे वे जन प्रतिनिधि बनाने के लिए चुनाव में उतरते। कोई महिला निर्दलीय रूप से भी मैदान में नहीं है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि इन विधानसभा क्षेत्रों में कुल पांच लाख 539 महिला मतदाता हैं। यह तादाद पुरुष मतदाताओं से मात्र 49 हजार 159 कम है। कुछ क्षेत्रों में तो महिला और पुरुष मतदाताओं की संख्या का अंतर हजारों में भी नहीं है। इसके बावजूद आधी आबादी जन प्रतिनिधि बनने की दौड़ से बाहर है।
इस तसवीर में नया कुछ भी नहीं है। 1962 से लेकर अब तक इन पंद्रह सीटों से सिर्फ एक महिला निर्वाचित होकर विधानसभा तक पहुंच पाई है। कांग्रेस की हाजरा बेगम 1977 में बनिहाल से निर्विरोध निर्वाचित हुई थीं। इसके पहले या इसके बाद अब तक कोई भी चुनाव मैदान में फतह हासिल करना तो दूर की बात, दूसरे नंबर पर भी नहीं आ सकी है।
पहले चरण के लिए लेह, कारगिल, नूबरा, जंसकार, किश्तवाड़, इंदरवल, डोडा, भद्रवाह, रामबन, बानिहाल, गुरेज, बांडीपोरा, सोनावारी, कंगन, गांदरबल सीटों पर चुनाव होने हैं। गौरतलब बात यह है कि इन सीटों पर राज्य की प्रमुख पार्टियों में से एक ने भी महिला उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतारा है।
ऐसा नहीं है कि पार्टियों के पास महिला कार्यकर्ताओं की कमी है। सभी पार्टियों की अपनी-अपनी महिला विंग है लेकिन चुनावों में महिलाओं को मौके नहीं मिल रहे हैं। चुनावों में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का दावा करने वाली पार्टियां इस मुद्दे पर चुप हैं।