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लाशों के ढेर से निकल दोबारा जिंदगी पाई

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88 वर्षीय दिलबाग सिंह की उम्र उस वक्त मात्र 20 साल की थी, जब पाकिस्तानी कबायलियों ने उनके गांव रैपटा, मीरपुर (अब पीओके में) पर हमला किया था। चारों ओर जान बचाने को हाहाकार था।
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दिलबाग भी अपने परिवार के साथ सब छोड़ अंजान मंजिल की ओर बढ़ गए थे। जहां पल बढ़कर बड़े हुए, उसी जमीन, घर और मोहल्ले को छोड़ उन्हें जाना पड़ रहा था।

दिलबाग के अनुसार जिन सड़कों में वह खेलते थे, वहां लाशें बिछीं थीं। लाशों के ढेर से निकलते हुए उन्हें यह अहसास नहीं था कि वह भी बच पाएंगे, लेकिन शायद भगवान को कुछ और मंजूर था।

50 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया था। पाकिस्तान कब्जे वाले कश्मीर को छोड़कर 11 लोगों के साथ आए दिलबाग आज परिवार के साथ जम्मू के बख्शी नगर में रहते हैं।
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जहां 1947 में सरकार ने उन्हें एक छोटा सा क्वार्टर अलाट किया था। बकौल दिलबाग, सरकार की ओर से प्रत्येक रिफ्यूजी को 3500 रुपये दिए गए। चूंकि हमने क्वार्टर मांगा तो 2200 काटकर 1300 रुपये मिले थे।

दिलबाग के अनुसार 1947 में माघ महीने की दस तारीख थी। रैपटा में ज्यादातर परिवार हिंदुओं और सिखों के थे। हमलावर घरों से निकाल कर उन्हें मार रहे थे।

महिलाओं के कान में कोई जेवर था तो उसे उतराने के लिए कान ही खींच ले रहे थे। हमलावर लोगों का कत्ल कर लाशें नहरों में फेंक रहे थे।

उनका एक ही मकसद था, लूटो और मारो। दिलबाग कहते हैं कि नौशेरा, सुंदरबनी, अखनूर, दोमाना में कुछ रातें बिताने के बाद वह नगरोटा पहुंचे। वहां कैंप में रहने के बाद जम्मू में रहने की उनकी व्यवस्था की गई।

आंखों के सामने दादा के कत्ल का हुआ प्रयास

मीरपुर के ही डडियाल में पैदा हुए वेद प्रकाश (76) ने अपनी आंखों के सामने दादा के कत्ल का प्रयास देखा। वेद के अनुसार नहर के पास चार लोगों को हमलावरों ने उलटा लेटा दिया।

देखते ही देखते कुल्हाड़ी मारकर उनकी जान लेनी शुरू की गई। चौथे नंबर पर उनके दादा की बारी थी। दादा ने कहा कि उन्हें इस तरह मारने से अच्छा गोली मार दो।

हमलावरों ने कहा कि काफिरों को हम गोली नहीं मारते। उनके दादा ने कुछ विरोध किया तो हाथापाई हुई, इसी दौरान उनके दादा नहर में गिर गए और तेज लहरों में बहने लगे। हमलावर उनके साथ दौड़ते रहे।

उन पर गोलियां भी बरसाईं, लेकिन उन्हें नहीं लगीं। इसी दौरान बहते हुए वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच गए। बाद में तबीयत बिगड़ने पर उनकी मौत हो गई। अंतिम संस्कार नहीं हो सकता था।

स्थानीय लोगों ने दादा के लिए खड्ढा खोदा और कहा यहीं दफना दो। उस समय वेद प्रकाश की उम्र आठ साल थी। वेद के अनुसार उनके शहर को आग लगा दी गई थी। उनके दो बड़े भाई बिछड़ गए थे, जिनकी उम्र 12 और 16 साल थी।

बाद में उनका मिलना हुआ। वह डडियाल से ठाठाने आ गए। रास्ते में कुएं महिलाओं की लाशों से भरे थे। कुछ महिलाओं ने दरिया में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी। पिता हरबंश लाल ने उस वक्त एमए की थी।

वहां के एक ठेकेदार ने उन्हें अपने पास रख लिया। उन्हें पढ़े लिखे व्यक्ति की जरूरत थी, जो उनका कारोबार देख सके। बाद में हालात ठीक होने पर पिता लौटे।

खाने को कुछ नहीं था। तीन दिन बाद उन्हें थोड़ा सा आटा दिया गया, तो रोटी बनाकर खाई। आज वह अपने परिवार के साथ जम्मू में रह रहे हैं।
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महिलाओं के बदले महिलाएं लीं, तब जान बची

पीओके के मलेतर की रहने वाली सत्या देवी घटना के समय मात्र 4-5 साल की थी। उनके परिवार के तमाम लोगों को मार दिया। बची थी तो मां और दो बहनें।

मां किसी तरह उन्हें लेकर निकली। चारों ओर लोगों को मारा जा रहा था। उनके पास कुछ नहीं था। हालत यह थी कि ठंड में उनके पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं थे।

कई बच्चे भयभीत होकर नंगे बदन ही माता-पिता के साथ अंजान राह पर बढ़ते जा रहे थे। किसी तरह उनकी मां उन्हें अली बेग लेकर पहुंचीं।

वहां हमलावरों ने उन्हें रोक लिया। उनका कहना था कि दूसरी ओर से महिलाओं को दिया जाएगा, तभी वह इस ओर से महिलाओं को छोड़ेंगे। उसके बाद दूसरी ओर से मुस्लिम महिलाओं को भेजा गया, तब उन्हें भेजा गया।

73 वर्षीय सत्या देवी कहती हैं कि उनके परिवार के जिन लोगों को मारा गया था, उनका संस्कार तक नहीं किया जा सका। उन्हें बाद में जानकारी मिली कि मलेतर और आसपास के इलाकों से 18 ट्रक कंकाल हरिद्वार भेजे गए।

उन कंकालों में अपनों को कोई नहीं ढूंढ पाया। चूंकि हम छोटे थे तो उन्हें उस समय कुछ पता भी नहीं था। बाद में मां हर बात बताती रही। कोटली से रिहा होने के बाद उन्हें लाहौर भेज दिया गया।

लाहौर से उन्हें अमृतसर भेजा गया। वहां कुछ दिन रहने के बाद उन्हें जम्मू भेजा गया। वर्तमान में सत्या देवी राजोरी में रहती हैं। उनके तीन बेटे और पांच बेटियां हैं।

एक बेटा पुलिस में नौकरी करता है। चार बेटियों की शादी हो चुकी है। सत्या को मलाल है कि उनका सब कुछ उजड़ गया, लेकिन सरकार अभी तक उनके प्रति गंभीर नहीं है।
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